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Category: समाज

मणिपुर में जातीय संघर्ष की तीन साल की वर्षगाँठ पर हजारों ने किया विरोध प्रदर्शन

बिलासपुर और इमरानपुर सहित कई शहरों में आज हजारों लोग सड़कों पर उतर कर यह याद दिला रहे हैं कि तीन साल पहले मणिपुर में शुरू हुए जातीय संघर्ष ने अभी तक ठीक‑ठीक घाव नहीं भर पाए हैं। प्रतिपादकों ने मृतकों के परिवारों की सहायता, विस्थापित लोगों के पुनर्वास, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं की बहाली की मांगें दोहराईं।

2023 में मेइती‑कुकी समुदायों के बीच जो हिंसा छिड़ी, उससे लगभग दो मिलियन लोग अपने घरों से बंधक बन गए। कई गांव स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह गए, स्कूल बंद हो गए और जल‑विद्युत जैसी बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति में व्यापक व्यवधान आया। अब तीन साल बाद भी शरणार्थी कैंपों में अस्थायी डॉरलाइट और टेंट ही आम हैं, जबकि सरकारी पुनर्वास योजना की प्रगति उंगलियों के निशान के बराबर दिखती है।

राज्य सरकार ने कई बार “पुनर्वास कार्य शीघ्र प्रारम्भ किया जाएगा” का बयान दिया, पर जमीन पर ठोस कदम कम ही दिखे। मौजूदा उपायों में केवल कुछ ही घरों को अस्थायी रूप से पुनःप्रवेषित किया गया, और अधिकांश लाभार्थियों को विस्तारित दस्तावेज़ीकरण की अनिवार्यता से जूझते रहना पड़ा। वहीं, सुरक्षा बलों की तैनाती में वृद्धि ने सामुदायिक तनाव को कभी‑कभी और बढ़ा दिया, जिससे नागरिकों की मूलभूत सुरक्षा के भरोसे पर धुंध छाई है।

प्रशासनिक अनिच्छा को लेकर स्थानीय नागरिक समूहों ने स्पष्ट संकेत दिया कि जब तक पुनर्वास के लिए आवश्यक बजट को वास्तविक कार्य में नहीं बदला जाता, तब तक सामाजिक असमानता और असंतोष को धूमिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “हर साल नई योजना बनती है, पर जमीन पर उतारने की जल्दी नहीं दिखती” — एक सूखी हँसी में संजोए निराशा की अभिव्यक्ति।

समाज के विभिन्न वर्गों—महिला, बच्चों, वृद्धों—पर इस संघर्ष के असर गहरे हैं। महिलाओं को अक्सर असुरक्षित शरणस्थलों में अनावश्यक जोखिम उठाना पड़ता है, बच्चों की पढ़ाई रुक गई और भविष्य की नौकरी के अवसर घटे। स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में लड़के-लड़कियों में सामान्य बीमारियों का स्तर बढ़ा, जबकि टिट्रेशन कार्यक्रमों की कमी के कारण रोग‑प्रकोप की आशंकाएं बनी हुई हैं।

केंद्रीय सरकार की ओर से “एकीकृत विकास योजना” का उल्लेख किया गया है, पर इसकी कार्यवाही में देरी और जिला‑स्तर पर आर्थिक संसाधनों का असमान वितरण इस बात की ओर इशारा करता है कि नीति‑निर्माण अभी भी जनता की जरूरतों की धारा से टकरा रहा है। जैसा कि कई संगठनों ने कहा, “यदि योजना पेपर पर ही बनी रहे, तो वह केवल कागज़ की बात बन जाएगी।”

तीन साल की इस वर्षगाँठ ने न केवल अतीत के दर्द को दोहराया, बल्कि भविष्य में समान संघर्ष रोकने के लिए प्रशासन की जवाबदेही को भी प्रश्नवाचक बना दिया है। जब तक पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की पूर्णता नहीं होती, तब तक सामाजिक सामंजस्य का पुनर्निर्माण केवल एक अधूरी प्रतिबद्धता रहेगी।

Published: May 4, 2026