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Category: समाज

मुंबई विश्वविद्यालय में 2026‑अंडरग्रेजुएट प्रवेश: नीति‑निर्धारण और सामाजिक असमानता का परीक्षण

मुंबई विश्वविद्यालय ने 6 मई से 2026‑27 शैक्षणिक वर्ष के लिए अंडरग्रेजुएट (UG) प्रवेश प्रक्रिया शुरू की। इस वर्ष प्रवेश की विंडो को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) के अनुरूप लचीलापन देने के लिए कई मेरिट‑लिस्टों और सख्त समय‑सीमा के साथ संरचित किया गया है। उच्च शिक्षण संस्थानों के इस ‘नवीनतम’ स्वरूप को पालने वाले प्रशासकीय तंत्र को, छात्रों की वास्तविक ज़रूरतों को समझने में कहाँ तक सफल माना जा सकता है, यह सवाल अभी भी बना हुआ है।

असहमति‑रहित रूप से कहा जा सकता है कि विश्वविद्यालय ने डिजिटल आवेदन पोर्टल बंद‑डोर नहीं किया है; लेकिन इस पोर्टल की पहुँच वहीँ तक सीमित है जहाँ इंटरनेट की स्थिरता, तकनीकी सहायता और पंजीकरण हेतु आवश्यक दस्तावेज़ीकरण की सही समझ मौजूद है। मध्य‑और निचले‑आय वर्ग के कई अभ्यर्थियों के लिए, ऑनलाइन फॉर्म भरना एक अतिरिक्त बाधा बन चुका है, जो केवल ‘डिजिटल विभाजन’ को और गहरा कर रहा है।

NEP‑2020 के प्रमुख बिंदुओं में से एक लचीले डिग्री‑पाथवे का परिचय है, जिससे छात्रों को दो‑साल के अंतराल में वैकल्पिक विषय‑विन्यास चुनने की सुविधा मिलेगी। तथापि, इस लचीलापन को लागू करने की तैयारी के लिये आवश्यक फंक्शनल प्लेटफ़ॉर्म और प्रॉफ़ेसर‑क्वोटा नियोजन अभी भी अधूरा प्रतीत होता है। कई विभागों ने अभी तक नए पाठ्यक्रम के लिए आवश्यक ‘सिलाबस‑एन-इंडियन-लाइसेंस’ की मंजूरी नहीं दी है, जिससे छात्र‑समुदाय में अस्थिरता बढ़ रही है।

आरक्षण एवं कोटा प्रणाली के तहत सामाजिक न्याय के दावे को कायम रखने के लिए विभिन्न वर्गीय श्रेणियों (जनजातीय, अल्पसंख्यक, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग आदि) को निर्धारित सीटें अलग रखी गई हैं। जबकि यह नीति सामाजिक समानता के लक्ष्य के साथ संगत है, वास्तविकता में सीटों की आवंटन प्रक्रिया में अक्सर ‘डेड‑लाइन‑मिस’ या ‘सूची‑टांग‑अधिकारी’ जैसी अनियमितताओं की खबरें आती रहती हैं। ऐसी कहानियाँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि नीति‑निर्माण और कार्यान्वयन के बीच मौज‑मस्ती का अंतराल अभी भी बना हुआ है।

प्रशासनिक पहलू से देखें तो, विश्वविद्यालय की मुख्य परीक्षा कार्यालय ने कई बार “हर पीक‑टाइम पर सर्वर लोड को संभालने हेतु अतिरिक्त सामर्थ्य जोड़ा जाएगा” का आश्वासन दिया, परन्तु वास्तविक समय में ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया कई बार ‘सर्वर डाउन’ या ‘डेटा लॉस’ की समस्याओं से ग्रस्त रही। ऐसी घटनाएँ छात्रों को केवल आशंकाओं से ही नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान (प्रिंट‑आउट, दस्तावेज़ीकरण) से भी प्रभावित करती हैं।

समाज के विभिन्न वर्गों के लिए यह प्रवेश प्रक्रिया एक दोधारी तलवार बनकर उभरी है। एक ओर, विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा नीति के प्रतिबिंब को अपनाने का प्रयास किया है, जिससे उच्च शिक्षा को अधिक लचीला और समावेशी बनाने का लक्ष्य स्पष्ट है। दूसरी ओर, प्रशासनिक ढांचा, डिजिटल पहुँच, और कोटा‑वितरण में मौजूद दोष यह संकेत देते हैं कि नीतियों को व्यावहारिक स्तर पर लागू करने में अभी काफी दूरी तय करनी बाकी है।

जब छात्र‑परिवार इस प्रक्रिया को देखते हैं, तो उनका प्राथमिक सवाल यही रहता है कि “क्या विश्वविद्यालय‑प्रशासन केवल कागजी प्रक्रिया में निपुण है, या वह वास्तविक सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने में भी सक्षम है?” भविष्य में इस प्रश्न का उत्तर तभी संतोषजनक हो सकता है, जब न केवल नीति‑निर्माताओं बल्कि कार्यान्वयनकर्ता भी समान रूप से उत्तरदायी मानें।

Published: May 6, 2026