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Category: समाज

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मुफ़्त गम की बवंडर: स्वास्थ्य, उपभोक्ता अधिकार और नीति‑असंतुलन

देश के कई नगरों में आज‑कल स्कूल‑कॉर्नर, अस्पताल‑लॉबी और सार्वजनिक संस्थानों में मुफ्त चबाने वाले गम के पैकेट बाँटे जा रहे हैं। इन वितरणों का उद्देश्य—‘स्वस्थ मुँह, ताज़ा साँस’—भले ही विज्ञापित किया जाता है, पर वास्तविक सामग्री अक्सर शक्कर‑युक्त, एडिटिव‑भारी और दंत‑साइज़र के प्रतिवादी होते हैं। ऐसी पहल, जो पहली नज़र में नागरिक‑सेवा की सराहना लगती है, असल में सामाजिक स्वास्थ्य‑नीति की बड़ी ख़ामियों को उजागर करती है।

ऐसा कौन‑सा वर्ग है जो इन मुफ्त गमों से प्रत्यक्ष‑प्रतिक्षेपित रूप से लाभान्वित हो रहा है? मुख्यतः आर्थिक सीमाओं के भीतर रहने वाले छात्र, श्रमिक वर्ग के गृहस्थ और वृद्ध नागरिक। उनके पास अक्सर पोषक‑संतुलित मिठाइयों की पहुँच नहीं होती; इसलिए निकटतम दान‑ड्रॉप‑ऑफ़ का चयन अनिवार्य बन जाता है। परन्तु इनकी निरंतर खपत से दंत‑क्षय, मोटापा और मेटाबोलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ता है—एक विरोधाभास जो नीति‑निर्माताओं को चुपचाप खा रहा है।

व्यावसायिक दिग्गजों ने इस मॉडल को आर्थिक विजय में बदल दिया। 19वीं सदी के अमेरिकी उद्यमी ने मुफ्त गम के प्रस्ताव से बाजार को हिला दिया था; आज भी भारतीय कंपनियां समान रणनीति अपनाकर लाखों उपभोक्ताओं को अपने ब्रांड के साथ जोड़ रही हैं। उनका ‘हर घर तक गम, हर फोन पर नंबर’ जैसा अभियान, सामाजिक नियमन के बजाय विपणन‑जिम्‍मेवारी पर अधिक जोर देता है।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया इसलिये कुप्रभावी रही है क्योंकि स्वास्थ्य‑सुरक्षा नियम अक्सर ‘अतिरिक्त’ के रूप में वर्गीकृत होते हैं, जबकि शर्तीय वितरण के दायरे में ‘उपभोक्ता संरक्षण’ ध्वनि नहीं देती। कई राज्य सरकारों ने केवल सूचना‑पत्र जारी किया है, जबकि उत्पाद‑लेबलिंग, शक्कर‑सीमा और सार्वजनिक स्थानों पर वितरण की अनुमति को आधिकारिक तौर पर विनियमित नहीं किया। यह परिप्रेक्ष्य दिखाता है कि नीतियों के कागज़ात और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच कितना फासला है।

समाज के व्यापक स्तर पर परिणाम स्पष्ट हैं: एक ओर तो उन वर्गों की पोषण‑सुरक्षा में खाई गहराती जा रही है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक स्वास्थ्य‑प्रणाली पर दीर्घकालिक बोझ बढ़ रहा है। इस स्थिति में ‘व्यावसायिक उद्यमी के मुफ्त उपहार’ को ‘राष्ट्र के बुनियादी अधिकार’ की तरह स्थापित करना, न केवल नीति‑निर्धारकों की अनदेखी को प्रमाणित करता है, बल्कि संस्थागत जवाबदेही के सिद्धांत पर सवाल उठाता है।

समाधान के लिए दो सिद्ध कदम आवश्यक हैं: पहला, मुफ्त वितरण को केवल वैद्यकीय‑सिफ़ारिश‑आधारित या पोषण‑संकट‑ग्रस्त समुदायों तक सीमित करना; दूसरा, शक्कर‑युक्त चबाने वाले उत्पादों पर स्पष्ट लेबलिंग और सतत निगरानी लागू करना। तभी हम यह कह पाएँगे कि ‘मुफ़्त गम’ अब स्वास्थ्य‑खतरे नहीं, बल्कि सामाजिक‑सुरक्षा की एक सचेत‑प्रेरित पहल बन गई है।

Published: May 6, 2026