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Category: समाज

मानसिक स्वास्थ्य नीति की टंग स्टिच: ‘इनर चाइल्ड’ थैरेपी पर बढ़ती ज़रूरत, सरकारी समर्थन में खाई

पिछले कुछ महीनों में ‘इनर चाइल्ड’ (आंतरिक बाल) सिद्धांत को लेकर सामाजिक मंचों और ऑनलाइन कोर्सों में आवश्यकता‑से‑अधिक चर्चा देखी जा रही है। यह अवधारणा, जिसे पहले सीमित मनोवैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में ही समझा जाता था, अब युवा‑वयस्क वर्ग के बीच आत्म‑संवाद सुधारने के साधन के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

हालाँकि, इस रवैये का नागरिक‑सुविधा के साथ कोई औपचारिक तालमेल नहीं दिखता। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2024‑25 के आंकड़े दर्शाते हैं कि वर्तमान में केवल 0.5 % जनसंख्या के पास प्रमाणित मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध है, जबकि मनोवैज्ञानिक मुद्दों की पहचान करने वाले लोगों की संख्या 20 % से अधिक है। इस अंतर को भरने के लिये निजी क्षेत्र ने ‘इनर चाइल्ड’ कार्यशालाओं, ऑनलाइन कोचिंग और मोटी‑मोटी स्वयं‑हेल्प पुस्तकें पेश कर दी हैं, जिनमें अक्सर प्रमाणित विशेषज्ञ नहीं होते।

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन के जवाब में, 2022 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) के तहत अतिरिक्त ₹150 करोड़ आवंटन की घोषणा हुई थी। परन्तु अतिशय हल्के‑सुगंधी बजट के कारण केवल 10 % जिलों में ही प्रशिक्षित काउंसलर उपलब्ध हैं, और उन भौगोलिक क्षेत्रों में भी वार्षिक प्रशिक्षण सत्र एक‑दूसरे के बाद दोहराते दिखते हैं – जैसे हर साल नई प्रिंटेड राइफल मिलती हो, पर गोली नहीं।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो, शहरी मध्य‑वर्ग के लोग ‘इनर चाइल्ड’ तकनीकों को आत्म‑सुधार के सौदे के रूप में अपनाते हैं, जबकि ग्रामीण एवं उपेक्षित वर्ग के लोग इस लहर से कट-ऑफ़ रह जाते हैं। यह असमानता न केवल मानसिक स्वास्थ्य के दायरे को सीमित करती है, बल्कि मौजूदा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘इनर चाइल्ड’ की अवधारणा स्वयं में हानिरहित है, पर जब इसे वैध मनोचिकित्सा के स्थान पर एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया जाता है, तो नीतिगत लापरवाही का स्पष्ट परिणाम सामने आता है। इस बीच, कई नागरिकों ने रिपोर्ट किया है कि बिना प्रमाणपत्र वाले कोच से मिलने वाली सलाह उनके मौजूदा तनाव को और बढ़ा देती है, जिससे आकस्मिक मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों में वृद्धि सम्भव है।

आलोचनात्मक रूप से कहा जाये तो, सरकार द्वारा मानसिक स्वास्थ्य के लिये ‘अभी‑बस’ बजट आवंटन करने के साथ ही वह खुद को ‘सिर्फ़ शब्दों में ही नहीं, बल्कि कार्यों में भी बदलने’ की चुनौती से बच रही है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2025 में कहा था कि भारत को 1 % से अधिक मानसिक स्वास्थ्य खर्च करना चाहिए, भारत के 1.4 बिलियन नागरिक अभी भी ‘आंतरिक बाल’ को समझने के लिये खुद‑सहायता किताबों पर निर्भर हैं, जबकि एक योग्य चिकित्सक की सेवा के लिये क़ीमत वहन नहीं कर पाते।

निष्कर्षतः, ‘इनर चाइल्ड’ फेनोमेना के फले‑फूले को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक नीति में हल्की‑फुल्की आरक्षणें नहीं, बल्कि ठोस बुनियादी ढांचा एवं प्रशिक्षित कार्यबल की आवश्यकता है। यदि सरकार अपनी वित्तीय सुगंध को केवल शब्दावली तक सीमित रखे, तो अगला उपाय निजी‑उद्यमियों पर भरोसा करना होगा – और यह भरोसा केवल तब सार्थक होगा, जब वह भी प्रमाणित पेशेवरता के साथ हो।

Published: May 5, 2026