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Category: समाज

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मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में पहुंच की कमी: भारतीय प्रणाली को अमेरिकी चेतावनी का सामना

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक संघ ने कहा कि संयुक्त राज्य में भी बहुत कम रोगियों को पूर्ण‑समग्र मानसिक स्वास्थ्य देखभाल मिल पाती है। यह स्पष्ट करता है कि उन्नत अर्थव्यवस्थाएँ भी इस बुनियादी स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता में जड़ता का सामना कर रही हैं। भारत में स्थिति इससे कहीं अधिक गंभीर लगती है, जहाँ सामाजिक असमानता, प्रशासनिक उदासीनता और नीति‑क्रियान्वयन में खामियों के चलते मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने वाले लोगों की संख्या सीमित ही है।

देश के ग्रामीण इलाकों में प्रति १००,००० जनसंख्या पर केवल ०.५ मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जबकि शहरी केंद्रों में भी यह अनुपात १.५ से अधिक नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर प्रारंभिक स्तर पर ही सीमित किया जाता है, जिससे दीर्घकालिक उपचार, पुनर्वास और समुदाय‑आधारित देखभाल तक पहुँच असंभव हो जाती है। यह आंकड़े केवल संख्यात्मक तथ्य नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की पीड़ा को दर्शाते हैं जो उचित परामर्श, दवा या थेरेपी की राह देख रहे हैं।

हालिया सरकारी निवेश की घोषणा ने आशा का एक दृश्य प्रस्तुत किया, परन्तु वास्तविक प्रभाव अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। नीति निर्माताओं ने ‘साक्ष्य‑आधारित’ उपचारों को प्राथमिकता देने की बात कही है, फिर भी बजट आवंटन में अधिकांश राशि केवल शहरी अस्पतालों और निजी प्रदाताओं को दी जा रही है, जबकि निचले वर्ग के लिए सस्ती सार्वजनिक सुविधाओं की कमी बनी हुई है। यह असमानता बढ़ती हुई कट्टरता, सामाजिक तनाव और आत्महत्या दर में वृद्धि के रूप में प्रतिफलित होती है—जिनका खजाना असंगत आंकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की कहानियों से पता चलता है।

प्रशासनिक तंत्र की लापरवाहियों को उजागर करने वाली एक और बात यह है कि कई राज्य में मानसिक स्वास्थ्य कानूनों का कार्यान्वयन अधूरा है। अक्सर रोगियों को मुफ्त दवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, परन्तु फॉलो‑अप देखभाल, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास केंद्रों की कमी को अनदेखा किया जाता है। यह वही ‘सफेद‑कोट वाले’ आश्वासन है—जो कागज़ पर तो मौजूद है, पर जमीन पर नहीं उतरता।

समुदाय में जागरूकता के कार्यक्रम, स्कूल‑आधारित परामर्श और कार्यस्थल में मानसिक स्वास्थ्य समर्थन जैसी पहलों की जरूरत पहले से अधिक स्पष्ट हो गई है। नीति निर्माताओं को न सिर्फ वित्तीय निवेश को बढ़ाना चाहिए, बल्कि उसकी वितरण प्रक्रिया को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना चाहिए। तभी भारत में ‘सभी के लिए मानसिक स्वास्थ्य’ का नारा वास्तविकता में बदल पाएगा, न कि केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक परोक्ष टिप्पणी बनकर रहेगा।

Published: May 7, 2026