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Category: समाज

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मेडिकल स्थितियों वाले कर्मचारियों ने कार्यालय‑आधान आदेश को चुनौती दी

कोरोना संकट के दौरान कई सरकारी और अर्ध‑सरकारी इकाइयों ने कार्यस्थल पर लचीलेपन को अपनाते हुए, दीर्घकालिक बीमारियों, शारीरिक असमर्थता या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा दी थी। अब, स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किए गए ‘सभी कर्मचारियों को कार्यालय में वापस बुलाएँ’ शीर्षक के आदेश ने उन ही सुविधाओं को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है।

यह आदेश न केवल उन कर्मचारियों के शारीरिक स्वास्थ्य को खतरे में डालता है, जो लगातार दवा सेवन, चिकित्सा सत्र या रीहैबिलिटेशन के तहत होते हैं, बल्कि उनके अधिकारों पर भी सवाल उठाता है। कई राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के कर्मचारियों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए, अधिकार‑विधि (विकलांग व्यक्तियों के अधिकार) अधिनियम, श्रम संबंधी नियमों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं कहा है।

कर्मचारियों ने अपनी दलीलों में बताया कि घर से काम करने की सुविधा ने उन्हें बीमारी के तीव्र चरणों में भी कार्य निरंतरता बनाए रखने की अनुमति दी, जिससे न केवल वे आर्थिक स्थिरता प्राप्त कर सके, बल्कि रोग प्रबंधन के लिए आवश्यक चिकित्सीय देखभाल भी समय पर ले सके। अनिवार्य कार्यालय‑आधान आदेश के तहत, उन्हें अब अत्यधिक यात्रा, संसाधन‑उपलब्धता की कमी और संक्रमण‑जन्य जोखिम का सामना करना पड़ेगा। यह स्थिति उनके शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य दोनों के लिए प्रतिकूल है।

प्रशासनिक पक्ष ने उत्तर में कहा कि ‘सभी कर्मचारियों की समान उपस्थिति आवश्यक है’ और ‘ऑफिस में स्वच्छता एवं सुरक्षा उपायों की पूर्ण तैनाती की गई है’। तथापि, कोई ठोस आँकड़े या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं प्रस्तुत किया गया है जो यह दर्शाए कि सभी कर्मचारियों की शारीरिक उपस्थिति से रोग नियंत्रण में सुधार हुआ है। यह सवाल उठता है कि क्या कार्यस्थल पर अनिवार्य उपस्थिति को प्राथमिकता देना, रोग‑प्रबंधन में उपभोग्य स्वास्थ्य‑सेवाओं को नज़रअंदाज़ करने से बेहतर नहीं?

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘सभी के लिए एक ही नुस्खा’ लागू करने की नीति, नौकरियों की विविधता और कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वास्थ्य आवश्यकताओं को नजरअंदाज़ करती है। इस प्रकार की व्यवस्था न केवल कर्मचारियों की उत्पादकता को प्रभावित करती है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की समग्र लचीलापन को भी घटाती है।

यह मामला अब श्रम अदालत में चल रहा है, जहाँ न्यायालय को यह तय करना होगा कि क्या स्वास्थ्य विभाग का आदेश मौजूदा अधिकार‑विधियों और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है। यदि न्यायालय इसे अस्वीकार करता है, तो इससे न केवल प्रभावित कर्मचारियों को राहत मिलेगी, बल्कि भविष्य में संस्थाओं को नीतियों में समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा भी मिलेगी।

सरकारी कार्यालयों में फिर से ‘डेस्क‑दिवास’ के दौर की शुरुआत होती दिख रही है, जबकि कई कर्मचारियों को ऐसे ही ‘डेस्क‑इन्फेक्शन’ का सामना करना पड़ेगा। यह विरोधाभास, जहाँ रोग‑नियंत्रण का दावा किया जाता है, वहीं वही नियमों की कठोरता से उन कर्मचारियों को असहाय बना दिया जाता है, जो सबसे अधिक स्वास्थ्य‑सुरक्षा की माँग करते हैं।

Published: May 7, 2026