मेटा पर बड़े प्रकाशकों से जुड़ा कॉपीराइट मुकदमा: भारतीय डिजिटल नीति को मिल रहा नया चुनौती
पाँच प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन गृहों और एक बेस्टसेलिंग लेखक ने अमेरिकी सामाजिक नेटवर्क कंपनी मेटा एवं उसके सीईओ मार्क ज़ुकेरबर्ग के विरुद्ध मुकदमा दायर किया है। क्रमशः दावा किया गया है कि कंपनी ने अपने Llama जनरेटिव एआई मॉडल को लाखों कॉपीराइट‑सुरक्षित पुस्तकों, लेखों और साहित्यिक कृतियों पर प्रशिक्षित किया, बिना लेखकों या प्रकाशकों की अनुमति के। यह कदम न केवल अमेरिकी बौद्धिक संपदा कानून का उल्लंघन माना जा रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर डिजिटल कॉपीराइट संरक्षण के सिद्धांतों को भी चुनौती देता है।
जबकि मुकदमा अमेरिकी न्यायालय में चल रहा है, इसका प्रभाव भारत में भी गहरा महसूस किया जा रहा है। हमारे देश में प्रकाशन उद्योग की आय अक्सर विदेशी बड़े प्रकाशकों के साथ साझेदारी पर निर्भर करती है, और भारतीय लेखकों को अपने कार्यों के लिए उचित रॉयल्टी मिलना अभी भी एक निरंतर संघर्ष है। एआई‑आधारित कंटेंट जेनरेशन की तेज़ी से बढ़ती मांग के साथ, यदि कॉपीराइट‑सुरक्षित सामग्री को अनधिकृत रूप से प्रयोग किया गया तो देश के रचनाकारों की आय एवं अधिकारों पर बड़ा क्षति हो सकता है।
वर्तमान में भारत की नीति‑निर्माण प्रक्रिया इस दिशा में स्पष्टता नहीं दिखा पा रही है। डिजिटल इंडिया के ध्येय में एआई को एक प्रमुख स्तंभ माना गया है, परन्तु बौद्धिक संपदा के संरक्षण को संगत रूप से नियमन करने हेतु कोई ठोस ढांचा अभी विकसित नहीं हुआ है। सरकार ने 2022 में एआई नीति का मसौदा जारी किया था, परन्तु उसमें कॉपीराइट‑उल्लंघन की रोकथाम या मुआवजा तंत्र का उल्लेख केवल सतही रूप से किया गया है। इस कारण से कई हितधारकों ने कहा है कि प्रशासन ‘नीति‑निर्माण में नाचता ही है, लेकिन मंच की रोशनी नहीं मिलती।’
सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी करुणा से परे, कड़वी है। लेखकों और प्रकाशकों के संघ ने कहा है कि ऐसे मामलों में सरकार की मौन स्थिति ‘अचानक पैदा हुई मंदी’ के समान है; जहाँ निजी कंपनियों को फ्री‑राइड करने की इजाज़त मिलती है, वहीं राष्ट्रीय हित का बचाव करने वाला कोई नियम नहीं बना। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय मुकदमों के परिणामस्वरूप भारत को अपनी कॉपीराइट क़ानूनी ढांचों को पुनः समीक्षा करनी होगी, जिससे भविष्य में एआई कंपनियों को भारतीय साहित्यिक संपदा का दुरुपयोग न करना पड़े।
यदि मेटा को इस मुकदमे में क्षतिपूर्ति करानी पड़े, तो वह सीधे भारतीय प्रकाशकों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है—एक ऐसी मिसाल जो एआई विकास को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ संतुलित करने की आवश्यकता को उजागर करेगी। वर्तमान में प्रशासनिक प्रतिक्रिया ‘बेरंग’ है; जहाँ तक सवाल है, नियामक निकायों ने अभी तक कोई सुनवाई, सुनवाई‑पत्र या सार्वजनिक विमर्श नहीं बुलाया है। यह ‘उड़ते‑हाथ’ नियमन की कहानी फिर से दोहराए बिना नहीं रह सकती।
जैसे ही यह मुकदामा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आगे बढ़ेगा, भारत को यह सोचने का अवसर मिलेगा कि डिजिटल तकनीक के लिए नियम‑कुशल ढांचा कैसे तैयार किया जाए, जिससे सृजनात्मक वर्ग को सुरक्षा मिले और एआई उद्योग को स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ आगे बढ़ने की अनुमति मिले। इस मध्यस्थता में अगर प्रशासन अंततः ‘विचार‑धारा’ न हो कर ‘कार्रवाई‑धारा’ बन जाए, तो यह भारतीय समाज के लिए एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेतक बन सकता है।
Published: May 6, 2026