माँ के दिन की खरीदारी के पीछे छिपी सामाजिक असमानताएँ और नीति‑असफलताएँ
परिवार के सबसे महत्त्वपूर्ण स्तम्भ, माँ, को सम्मानित करने का अन्दाज़ हर साल 10 मई को "माँ के दिन" के रूप में स्थापित हो गया है। इस अवसर पर उपहार‑भेंट का चलन न सिर्फ बाजारों में ख़रीद‑फरोख्त को तेज़ करता है, बल्कि सामाजिक ढाँचे में गहरी असमानताओं को भी उजागर करता है।
आजकल ऑनलाइन सर्वे‑क्षितियों में यह स्पष्ट हो रहा है कि कई लोग इस दिन के लिए उपहारों की कल्पना में उलझे रहते हैं। सोशल मीडिया पर आते हैं विविध विचार‑विमर्श: बासिक फूलों की सुंदरता से लेकर महँगे गहनों तक, सभी को "किसी ने मुझे सबसे अच्छा उपहार दिया" वाले खण्ड में सजाया जाता है। यह संपूर्ण संवाद भौगोलिक, आय‑सामाजिक, और शैक्षिक विभेदों को पृष्ठभूमि में धुंधला कर देता है।
वास्तविकता में, मध्यम‑और‑निचली आय वर्ग के लोग अक्सर यह तय करने में दुविधा में पड़ते हैं कि वे माँ के लिए क्या दे सकते हैं, जबकि वही वर्ग, अपनी सीमित आय के बावजूद, सामाजिक दबाव के कारण महँगे उपहार चुनने के लिए कर्ज़ तक उठाते हैं। इस उलझन में शिक्षा प्रणाली की भूमिका भी अनदेखी नहीं रह सकती: स्कूल‑पाठ्यक्रम में मातृत्व के सामाजिक‑आर्थिक मूल्य को समझाना बंद कर, केवल उत्सव‑विज्ञापन में ही सीमित कर दिया गया है।
इस स्थिति को सुधारने के लिये सरकार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, यह सवाल कई बार उठाया जाता है, पर उत्तर अक्सर खाली घोषणाओं में ही समाप्त हो जाता है। इसी वर्ष कुछ राज्य सरकारों ने "माँ को सम्मान" के नाम पर विशेष संदेश जारी किए, परन्तु माँ‑के‑अधिकारों के लिये कोई ठोस नीति‑बदलाव नहीं आया। उदाहरण के तौर पर, मातृत्व अवकाश, बाल देखभाल सुविधा, और स्वास्थ्य देखभाल में सुधार के लिये बजट आवंटन में साल‑दर‑साल वृद्धि के बावजूद वास्तविक लाभों की कमी बनी हुई है।
व्यावहारिक रूप से, सार्वजनिक नीतियों की इस चपेट में माँ के दिन को एक निरर्थक व्यावसायिक अवसर बना दिया गया है। जबकि कई गाँवों में अभी भी स्वच्छ जल, स्वास्थ्य सुविधा, और नर्सिंग शिक्षा की कमी है, शहरी बाजारों में माँ के लिए प्रीमियम चॉकलेट, लक्ज़री बैग, और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की बिक्री धूमधाम से बढ़ रही है। यह व्यंग्यात्मक रूप से दर्शाता है कि "पब्लिक ग्रेशेज" के बजाए "प्राइवेट ग्रेशेज" को प्राथमिकता दी जा रही है।
ऐसे में, सामाजिक उत्तरदायित्व केवल अभिव्यक्ति नहीं रह जाना चाहिए, बल्कि नीति‑स्तर पर भी प्रतिबिंबित होना चाहिए। माँ के अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिये, सरकार को निम्नलिखित उपायों पर विचार करना चाहिए:
- सभी कार्यस्थलों में पेड मैटरनिटी लीव का अनिवार्यकरण, जिससे आर्थिक दबाव कम हो।
- शहरी‑ग्रामीण क्षेत्रों में किफायती बाल‑देखभाल केंद्रों का निर्माण, जिससे माँ को कार्य‑जीवन में संतुलन मिले।
- सार्वजनिक शिक्षा में मातृत्व, बाल‑सुरक्षा और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
- स्थानीय निकायों द्वारा "माँ के दिन" के अवसर पर निःशुल्क स्वास्थ्य जांच और पोषण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
निष्कर्षतः, माँ के दिन को केवल बाजार‑संचारित उपभोग के मंच पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति‑निर्माण के एक महत्वपूर्ण बिंदु पर ले जाने की आवश्यकता है। केवल तभी इस दिन का अर्थ उन महिलाओं के लिये सच्ची सराहना में तब्दील हो पाएगा, जिनके बिना परिवार की नींव ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति भी संभव नहीं।
Published: May 4, 2026