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Category: समाज

भविष्य की आपदाओं पर सट्टा: भारत में भविष्यवाणी बाजारों का उदय और नीति‑का उत्तर

वास्तविकता और कल्पना के बीच की रेखा, अब कॉइन‑ट्रेडिंग प्लेटफ़ॉर्मों द्वारा धुंधले ध्वनि में बदल रही है। पोलिमार्केट, काल्शी जैसी विदेश‑से जुड़ी भविष्यवाणी बाजारों ने भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को संभावित बाढ़, अनुशासनहीन गर्मी‑लहर, या महामारी‑जैसी आपदाएँ सट्टा लगाने का अवसर दे दिया है। यह न केवल जोखिम‑भरे बाजार का स्वरूप बदलता है, बल्कि सामाजिक‑आर्थिक विषमता को नई ऊँचाइयों पर ले जाता है।

आधुनिक भारत में जलवायु‑संकट, स्वास्थ्य आपदा और बुनियादी सुविधा की कमी नियमित खबर बन चुके हैं। 2024‑25 के मध्य में उत्तर पूर्व में हुई बाढ़, राजस्थान में तीव्र गर्मी‑लहर और कई क्षेत्रों में एंटी‑ज्वर रोगों का उछाल, इन घटनाओं की पूर्वानुमान में भविष्यवाणी प्लेटफ़ॉर्मों ने सक्रिय भूमिका निभाई। नागरिकों को अब इस बात का अनुमान लगाने की आज़ादी है कि अगला वर्ष या महीना कितनी बाढ़ लाएगा, और किस क्लास में इस पर सट्टा लगाया जा सकता है।

परंतु इस उद्यम की असली कीमत कहाँ चुकायी जा रही है? सबसे पहले तो उन वर्गों को देखें, जिनके पास न तो गरीबी‑रोधक सुरक्षा जाल है, न ही डिजिटल साक्षरता। ग्रामीण महिलाओं, दैनिक प्रवासियों और असुरक्षित श्रमिकों को अक्सर यह नहीं पता चल पाता कि ये प्लेटफ़ॉर्म नियामक मानकों के अन्तर्गत नहीं आते, बल्कि एक अर्ध‑अवैध सट्टा बाजार के रूप में काम करते हैं। वे अपनी छोटी‑छोटी बचत को भविष्यवाणी में लगाते हैं, उम्मीद करते हुए कि किसी बड़े आपदा के बाद सरकार की सहायता या बीमा का लाभ मिल सकता है। दर्जनों मामलों में यह दिखा गया है कि ऐसे सट्टे न केवल पूँजी हानि का कारण बनते हैं, बल्कि सामाजिक‑मानसिक तनाव को भी बढ़ाते हैं।

वहीं, नीति‑निर्माताओं की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक रूप से निष्क्रिय रही। कई महीनों तक, राष्ट्रीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से लेकर भारतीय रिज़र्व बैंक तक ने इस प्रकार के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को नियामक दायरे में लाने की कोई ठोस पहल नहीं की। नियामक प्रावधानों में इस तरह के “बाजार‑आधारित सट्टा” को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया, जिससे “वन‑सीज़न-फिट‑ऑल” नीति‑कोर में एक बड़ा छिद्र रह गया। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस अभाव को दर्शाता है कि नीति‑निर्माताओं ने महामारी‑उतराई, जलवायु‑परिवर्तन, और डिजिटलीकरण पर क्रमशः तैयारियों को प्राथमिकता दी, जबकि “डिजिटल सट्टा” को अनदेखा कर दिया।

एक सूक्ष्म व्यंग्य यह है कि जहाँ सरकार कई‑साल‑पिछले योजनाओं को ‘रोल‑आउट’ करने में तमाशा करती है, वहीं निजी प्लेटफ़ॉर्म को आपदा की भविष्यवाणी पर ‘सट्टा’ करने की आज़ादी दी जा रही है। यह असंतुलन न सिर्फ सार्वजनिक विश्वास को हिलाता है, बल्कि काउंसिल‑से‑फ़्रेमवर्क को भी उलझा देता है। यदि नियामक तंत्र स्वयं 18‑वर्षीय वर्ग के लिए सट्टेबाज़ी को वैध मानता, तो क्या यह नीतियों की (अ)समानता का प्रमाण नहीं होगा?

आगे चलकर, इस कूदते‑झांकते ढाँचे के संभावित गंभीर परिणाम स्पष्ट हो रहे हैं। यदि इस प्रकार के सट्टे बड़े पैमाने पर प्रचलित हो गए, तो वित्तीय नुकसान के साथ‑साथ सामाजिक‑विरोधी प्रवृत्ति भी उत्पन्न हो सकती है। जब लोग जोखिमपूर्ण सट्टे के माध्यम से ‘आशा’ तलाशते हैं, तो वह सरकारी सहायता के प्रति अविश्वास को बढ़ाता है। इससे कई क्षेत्रों में आपदा‑प्रबंधन की प्रभावशीलता घटेगी, क्योंकि जनता आधिकारिक सूचना स्रोतों पर कम भरोसा करने लगेगी।

समाधान की दिशा में कदम उठाना आवश्यक है। सबसे पहले, नियामक एजेंसियों को भविष्यवाणी बाजारों को स्पष्ट रूप से वर्गीकृत कर, लाइसेंस‑आधारित ढाँचे में लाना चाहिए। इसके साथ ही, डिजिटल साक्षरता और वित्तीय शिक्षा को ग्रामीण‑शहरी सीमाओं पर समान रूप से सुदृढ़ करना होगा, ताकि सट्टा‑संबंधी जोखिमों से जनता की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। अंत में, आपदा‑प्रतिक्रिया योजनाओं में वैकल्पिक डेटा स्रोतों के उपयोग को प्रोत्साहित करते हुए, ऐसे प्लेटफ़ॉर्म को सरकारी आँकड़ों के साथ एकीकृत किया जा सके। तभी “भविष्य की आपदा पर सट्टा” को सामाजिक‑सुरक्षा के बोझ के रूप में नहीं, बल्कि सूचना‑समस्याओं का समाधान मान कर नियामक उत्तरदायित्व को पुनः स्थापित किया जा सकेगा।

Published: May 4, 2026