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Category: समाज

भावनात्मक स्वास्थ्य पर चर्चा: नीति‑निर्माताओं को चाहिए ठोस कदम

स्वस्थ समाज की परिभाषा केवल शारीरिक रोग‑मुक्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन भी है—इसी बात को रेखांकित करते हुए क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक डॉ. एमा हेपबर्न ने एक हालिया संवाद में कहा कि भारत में भावनाओं की समझ और नियमन के लिये बुनियादी ढाँचागत सुधार आवश्यक हैं। उनका तर्क, जो अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और भारत‑विशिष्ट आँकड़ों पर आधारित है, नीति‑निर्माताओं की तत्काल कार्रवाई की माँग करता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2023 के आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग 7 % वयस्कों को मनोवैज्ञानिक विकार का कोई न कोई रूप है, जिसमें बर्नआउट, अवसाद और चिंता प्रमुख हैं। महामारी‑के‑बाद इस आँकड़े में 2 % से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, और यह वृद्धावस्था से लेकर किशोर‑युवाओं तक हर आयु‑समूह को प्रभावित कर रही है। हालांकि, भारत के 1.3 अर्ब जनसंख्या में केवल 0.75 डॉक्टर प्रति 10 हजार लोग मनोविज्ञान या मनो‑चिकित्सा में विशेषज्ञता रखते हैं। यह अंतराल न केवल रोगियों की पहुँच को सीमित करता है, बल्कि सामाजिक‑आर्थिक असमानताओं को और गहरा करता है।

डॉ. हेपबर्न के अनुसार, भावनात्मक शिक्षा का अभाव स्कूल‑पाठ्यक्रम की प्रमुख कमी है। “एक बच्चे को गणित की समस्या सुलझाने के लिए टीचर मिलता है, पर उसकी भावनाओं को समझाने वाले कोई शिक्षक नहीं होते,” उन्होंने व्यंग्य किया। वर्तमान राष्ट्रीय शैक्षिक नीति (NEP) 2020 में सामाजिक‑भावनात्मक सीखने (SEL) को उल्लेखित किया गया है, पर व्यावहारिक कार्यान्वयन अभी तक कागज़ पर ही है। ग्रामीण स्कूलों में तो यह शब्द ही नहीं सुना जाता।

प्रशासनिक जवाब‑देही के संदर्भ में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) 2022 में बजट को दो गुना करने की घोषणा की गई थी, पर वास्तविक खर्च पर गहरी चुप्पी है। कई राज्य सरकारों ने “आधारभूत स्तर पर” मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थापना की घोषणा की, पर 2025‑26 में भी केवल 20 % सार्वजनिक अस्पतालों में मानकीकृत परामर्श कक्ष उपलब्ध हैं। “जैसे फ़ाइलों में ‘जज़्बात’ को वर्गीकृत किया गया हो, पर असली फ़ाइलें तो घरों में ही बनी रहती हैं,” डॉ. हेपबर्न ने कहा, जो नीति‑निर्माण में अक्सर देखी जाने वाली अनजाने दूरी को उजागर करता है।

भारी श्रम बाजार और अनिश्चित भविष्य भी भावनात्मक अस्थिरता को तेज़ कर रहा है। विशेषकर अस informal सेक्टर के कामगार, जो सामाजिक सुरक्षा के बिना न्यूनतम वेतन पर काम करते हैं, उन्हें तनाव प्रबंधन के लिए कोई सार्वजनिक मंच नहीं मिलता। इस वर्ग पर “स्मार्टफ़ोन‑आधारित” मनो‑सलाहकार ऐप्स का प्रचार करने से पहले यह देखना आवश्यक है कि इंटरनेट कनेक्टिविटी और डेटा खर्च उनकी रोज़मर्रा की लड़ाइयों में बाधा न बन जाए।

डॉ. हेपबर्न ने सुझाव दिया कि भावनात्मक स्वास्थ्य को मुख्यधारा में लाने के लिये तीन प्राथमिक कदम आवश्यक हैं: (1) राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में SEL को अनिवार्य बनाना, (2) अस्पताल‑स्थलीय मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का 70 % तक कवरेज सुनिश्चित करना, और (3) कार्यस्थल‑आधारित मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्रों के लिये स्पष्ट मानक स्थापित करना। उन्होंने यह भी कहा कि “नए नियमों की घोषणा से पहले, पुराने नियमों की पूर्ति सुनिश्चित करना चाहिए”, जो अक्सर नीति‑निर्माताओं की “सूची‑बद्ध योजना बनाना, लेकिन जमीन पर कार्यान्वयन न करना” वाली आदत पर संकेत देता है।

समाज के विभिन्न वर्गों—छात्र, कामगार, वरिष्ठ नागरिक—सब ही भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता रखते हैं। यदि सरकार इन मांगों को मात्र शब्दों में ही सीमित रखेगी, तो सामाजिक असमानता और सार्वजनिक स्वास्थ्य की लागत दोनों ही बढ़ते जाएंगे। इस संदर्भ में, डॉ. हेपबर्न का समापन संदेश स्पष्ट है: “भावनाओं को संभालना कोई वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है; इसे नज़रअंदाज़ करने वाला वही है जो अपना सुनहरा बकेट लिंट्री पर रखता है।”

Published: May 5, 2026