विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
भारत में सांपदंश संकट: अस्पतालों की अक्षम्य अनदेखी और ग्रामीण जनता की जोखिमभरी स्थिति
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार हर साल लगभग 5.4 मिलियन लोग साँप के काटने का शिकार होते हैं, जिनमें 1.8 से 2.7 मिलियन मामलों में विषाक्रमण (एनवेनोइंग) दर्ज किया गया है। इन आँकड़ों में भारत का योगदान अधिकतम है, जहाँ वर्ष‑दर‑वर्ष लाखों ग्रामीण निवासियों को सांपदंश का खतरा झेलना पड़ता है।
हालाँकि भारतीय सरकार ने 2017 में राष्ट्रीय एंटीवेनम उत्पादन नीति अपनाई, फिर भी एंटीवेनम की उपलब्धता में विशाल अंतर बना हुआ है। धड़कते छोटे कस्बों और दूरदराज़ के गांवों में अक्सर स्वास्थ्य‑केंद्रों तक पहुँचने में कई घंटे‑दिन लगते हैं, जबकि एंटीवेनम को तेज़ी से प्रशीतित रखना आवश्यक होता है। यह रिवर्स‑लॉजिकल असमानता, जहां शहरी अस्पतालों में पर्याप्त स्टॉक रहता है, वहीं ग्रामीण क्लिनिकों में “कंटेनर खाली” की सूचना मिलती है, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की अक्षमता को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।
सांपदंश के कारण होने वाली मृत्यु दर में स्पष्ट गिरावट तब आई, जब क्षेत्रीय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (PHC) को एंटीवेनम का नियमित आपूर्ति सुनिश्चित किया गया। परंतु हालिया मिड‑टर्म रिव्यू दर्शाता है कि लगभग 30 % ऐसे केंद्रों में अभी भी पर्याप्त स्टॉक नहीं है, जबकि कई राज्यों में “एक दिन में दो बार” के प्रयोगात्मक डोज़ को सटीक रिकॉर्डिंग का अभाव है। यह न केवल डेटा‑ड्रिवन नीति‑निर्माण में बाधा बनता है, बल्कि उन लोगों को भी जोखिम में डालता है, जो सौम्य बीमारियों के बजाय विषाक्रमण को पहले कारण मानते हैं।
यात्रियों और स्थानीय किसानों के लिए यह समस्या दोहरे रूप में प्रकट होती है। खेतों में कार्यरत मजदूर अक्सर पीली‑धारी, किंग कोब्राकर जैसी अत्यंत विषभरी प्रजातियों से मिलते हैं, जबकि पर्यटन स्थलों में विदेशी यात्रियों को अपरिचित क्षेत्रों में सांपदंश के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी जाती है। तथ्य यह है कि अधिकांश यात्रियों को एंटीवेनम उपलब्धता के बारे में स्थानीय प्रशासन से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती। यह सूचना‑अभाव, सार्वजनिक सुविधा के अभिविन्यास में खामियों का संकेत देता है।
नीति‑स्तर पर, कई विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि एंटीवेनम का उत्पादन और वितरण एकीकृत राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से होना चाहिए, जिससे जिलों‑दर‑जिला वास्तविक स्टॉक‑लेवल का निरंतर ट्रैकिंग संभव हो सके। साथ ही, प्रथम उत्तरदाता (सर्विस एम्ब्युलेंस, ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ता) को प्रारंभिक प्राथमिक उपचार (जैसे बैंडेज़, टूरन सेटिंग) में प्रशिक्षित करना, समय पर एंटीवेनम पहुँचाने में समय‑सीमा को घटा सकता है।
संकट के केंद्र में है प्रशासनिक प्रतिक्रिया का टुक‑टुकाव। कई मामलों में, स्थानीय सरकारी अधिकारी “अभी प्रक्रिया चल रही है” का उत्तर देते हैं, जबकि प्रभावित परिवारों को अपने नुकसान की भरपाई के लिए कई महीनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस अक्षम्य अनदेखी ने न केवल पीड़ितों के जीवन को खतरे में डाला, बल्कि सामाजिक असमानता को और गहरा किया।
समाज में बढ़ते सांपदंश के डर को देखते हुए, सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण को पुनः प्रयुक्त करना अनिवार्य है। यह केवल एंटीवेनम के भौतिक उपलब्धता तक सीमित नहीं, बल्कि समय पर पहुँच, जागरूकता अभियान, और प्रभावी डेटा‑प्रबंधन के माध्यम से एक समग्र समाधान की मांग करता है। वरना, एक और साल बीतेगा, जहाँ “एक बूंद विष” भी सैकड़ों जीवन ले लेगी, और वही अछूता सार्वजनिक रोग‑नियंत्रण का संकेत बना रहेगा।
Published: May 7, 2026