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Category: समाज

भारत में तैराकी सुविधाओं की कमी पर सवाल, जबकि विदेश में विश्व रिकॉर्ड टूट रहा है

फ्लोरिडा के फोर्ट लॉडरडेल ओपन में अमेरिकी तैराकी सम्राज्ञी ग्रेटचन वॉल्श ने 54.33 सेकंड में 100 मीटर बटरफ्लाई पर अपना विश्व रिकॉर्ड तोड़ा। इस उपलब्धि का जश्न विदेश में धूमधाम से मनाया जा रहा है, परंतु भारत अपने एथलीटों के विकास के मूलभूत बुनियादी ढाँचे से चुपचाप पीड़ित है।

वॉल्श की रिकॉर्ड‑बर्स्टिंग दौड़ इस बात की याद दिलाती है कि हाई‑परफ़ॉर्मेंस स्पोर्ट्स को समर्थन देने वाले देशों में, शीर्षक‑बदलते एथलीटों को लगातार नई सुविधाएँ, विशेषज्ञ कोचिंग और वैज्ञानिक सपोर्ट मिलता है। भारतीय तैराकी संघ की आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर केवल कुछ ही स्टेडियम में ओलंपिक‑साइज़ पूल उपलब्ध हैं, और उनमें से कई उम्र‑पर्याप्त रख‑रखाव से वंचित हैं। इस परिणामस्वरूप, कई युवा प्रतिभाएँ प्रशिक्षण के शुरुआती चरण में ही असुविधा और वित्तीय बाधाओं के कारण रूखि बदल लेती हैं।

सरकार ने हाल ही में खेल में निजी‑सार्वजनिक भागीदारी (PPP) मॉडल अपनाने का वादा किया था, परंतु लागू करने में टू‑टॉल (धीरज) की कमी स्पष्ट है। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, जहाँ जल-संसाधनों की कमी और स्वच्छता के मुद्दे प्रमुख हैं, तैराकी को प्राथमिकता देना नीति‑निर्माताओं के लिए एक व्यावहारिक चुनौती बन गया है। यह अनदेखी न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि जल‑सुरक्षा एवं इलाकाई असमानताओं को भी गहरा करती है।

ध्यान देने योग्य है कि उच्च प्रदर्शन वाले एथलीटों के लिए आवश्यक पोषण, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, और वैद्यकीय देखभाल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी अक्सर अपूर्ण रहती हैं। कई मामलों में, एथलीटों को निजी कोचिंग लेनी पड़ती है, जिसके लिये आर्थिक शक्ति अनिवार्य बन जाती है—जिससे सामाजिक असमानता और गहरा असर पड़ता है।

प्रशासन के लिए प्रश्न स्पष्ट है: क्या राष्ट्रीय खेल नीति में तैराकी को ‘प्राथमिक’ बना कर विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले पड़ोसियों के साथ कदम मिलाया जा सकता है? क्या सार्वजनिक पूलों के निर्माण और रख‑रखाव के लिए बजट आवंटन को प्राथमिकता दी जाएगी? या फिर मौजूदा ‘कब्जा‑झकड़’ वाली प्रक्रियाएँ ही इस दिशा में बाधा बनेंगी?

जैसे ही ग्रेटचन वॉल्श ने एक बार फिर अपनी सीमाओं को परखा, भारत में अनगिनत आकांक्षी तैराकों को अभी भी बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है। नीति‑निर्माताओं को अब व्यंग्यात्मक रूप से कहा जा सकता है—‘हमें तो बस एक तैराकी पुल की जरूरत है, जो तकिया नहीं, बल्कि टाइल से बना हो’। आशा है कि यह अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि न केवल सितारों को चमकाने का कारण बनें, बल्कि हमारे घरों की तैराकी पूलों को भी जल‑सुबह के सपनों से दूर लाए।

Published: May 3, 2026