भारत में जेन‑ज़ी की असहजता: शिक्षा, रोजगार और सामाजिक समर्थन की कमी पर सवाल
आज के भारत में बीस‑तीस की उम्र के कई युवा खुद को सामाजिक परिदृश्य से बाहर‑बाहर महसूस कर रहे हैं। उनका अस्थिर मनोस्थिति, नौकरी‑बाजार की अटकलबाज़ी और शिक्षा‑प्रणाली की असंगतियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह सिर्फ व्यक्तिगत संकट नहीं, बल्कि नीतियों की झिलमिलाती परछाई है।
सबसे पहले, शिक्षा‑क्षेत्र में अभ्यस्त नये पाठ्यक्रम और पुरानी शिक्षण‑विधियों के बीच का अंतर जेन‑ज़ी को निरंतर तनाव में धकेलता है। कई कॉलेजों में आज भी पुरानी सिलेबस का चलन है जबकि उद्योगों को डिज़िटल कौशल वाले कर्मचारियों की माँग है। इस असमानता ने युवा वर्ग में निराशा की लहर पैदा कर दी है, जिससे उनके भविष्य के बारे में ‘असुरक्षित’ मनोभाव पनपता है।
रोजगार के अवसर भी समान रूप से अनिश्चित हैं। औद्योगिक विकास के बावजूद, भारत में युवा बेरोजगारी दर 12 % के आसपास बनी हुई है, और इस आँकड़े में ग्रामीण‑शहरी विभाजन स्पष्ट है। शहरी क्षेत्रों में स्टार्ट‑अप इकोसिस्टम का विकास हुआ है, पर यह लाभ केवल उन युवाओं तक पहुँच रहा है जिनके पास पूँजी या उचित नेटवर्क है। बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा डिजिटल बुनियादी संरचना की कमी और स्थानीय उद्योगों के पतन के कारण अपनी योग्यताओं का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक मान्यताएँ अभी भी प्रतिबंधात्मक हैं। युवा वर्ग में डिप्रेशन, एंग्जायटी और आत्महत्या के मामलों में निरंतर बढ़ोतरी एक संकेत है कि स्वास्थ्य‑सेवा प्रणाली में युवा‑विशेष जुड़ाव की कमी है। सरकारी योजनाएँ अक्सर ‘मनोरोग के बारे में जागरूकता’ को अल्पकालिक अभियानों तक सीमित रखती हैं, जबकि निरंतर काउंसलिंग, सुदृढ़ स्कूल‑काउंसिलर नेटवर्क और किफायती चिकित्सा सुविधाएँ नहीं पहुँच पातीं।
इन समस्याओं पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर ‘सुपरफ़िशियल’ रह गई है। हाल ही में कई राज्य सरकारों ने ‘युवा विकास मंच’ का भी गठन किया, पर वास्तविक कार्यान्वयन में बजट की कमियों और अभिलेखीय विलंब ने इन मंचों को कागज़ी चर्चा तक सीमित कर दिया है। नीति‑निर्माताओं ने डिजिटल साक्षरता बढ़ाने के लिए कई स्कीमें लॉन्च कीं, पर ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट पहुँच की गति अभी भी शहर के एक हिस्से की तुलना में पाँच गुना कम है। यह स्थितियों को ठीक करने के बजाय ‘निरीक्षणात्मक’ दिखावा बना देता है।
समाज में इस असुरक्षा का असर केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास के पैमाने पर भी दिखता है। यदि आज की जेन‑ज़ी अपने कौशल को पूर्ण रूप से उपयोग नहीं कर पाती, तो देश की आर्थिक प्रतिस्पर्धा और नवाचार शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस दिशा में आवश्यक है कि शिक्षा‑नीति को उद्योग की माँग के साथ संरेखित किया जाए, रोजगार सृजन के लिए स्थानीय उद्योगों को पुनर्जीवित किया जाए, और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बुनियादी, सुलभ और निरंतर सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
रूपक के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत की युवा शक्ति एक अधूरी पेंटिंग है—भरे हुए रंग तो हैं, पर किनारे की परिपूर्णता अभी बिखरी हुई है। इस पेंटिंग को पूरा करने के लिए केवल कागज़ पर ‘हिंदीतंत्र’ नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस कदम और ज़िम्मेदार प्रशासनिक जवाबदेही चाहिए।
Published: May 6, 2026