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भ्रूण चयन सेवाओं पर भारत में नीतिगत अड़चनें और सामाजिक विषमता की चुनौतियाँ
अलीकड़े वर्षों में निजी कंपनियों ने गर्भाधान के प्रारम्भिक चरण में ही भ्रूण के जीनुम द्वारा संभावित रोगों एवं इच्छित स्वभाविक गुणों की भविष्यवाणी करने की सुविधा प्रदान कर ली है। इस तकनीक को अक्सर प्री‑इमब्रीओन जीन टेस्ट (PGT) कहा जाता है, जिससे अभिलाषी माता‑पिता हजारों रोगों के जोखिम का आँकलन कर, मनचाहे लक्षणों वाले भ्रूण का चयन कर सकते हैं।
भारत में इस सेवाओं के उदय को देखते हुए कई सामाजिक प्रश्न उजागर हो रहे हैं। सबसे प्रमुख है आर्थिक असमानता। यह सुविधा केवल वहन करने वाले वर्ग के लिये सुलभ है; टॉप‑टियर अस्पतालों में एक चक्र का खर्च कई लाख रुपये तक पहुँच सकता है। परिणामस्वरूप अमीर वर्ग अपने संतान के स्वास्थ्य व भविष्य को ‘चुनी‑चुनाई’ के माध्यम से दृढ़ बना रहे हैं, जबकि आम जनसंख्या की वैध आशा बस प्राकृतिक प्रसव या साधारण एंटी‑डायरेक्ट फर्टिलाइज़ेशन तक सीमित बनी हुई है।
इसके अतिरिक्त सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि उचित निगरानी न हो तो इस तकनीक से लिंग चयन, जातीय/धार्मिक मानदंडों के आधार पर पूर्व‑निर्धारित प्राथमिकताओं को लागू किया जा सकता है। संभावित ‘ईयुजेनिक’ प्रवृत्तियों से सामाजिक विविधता का क्षरण हो सकता है, जिससे पहले से ही मौजूद सामाजिक असंतुलन और गहरा हो सकता है।
नीति स्तर पर भारत का जवाबदारी अनुपलब्ध है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने अभी तक इस क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं, जबकि विदेश में कई देशों ने पहले ही कड़ी रेगुलेशन स्थापित कर ली है। मौजूदा नियम केवल ‘सर्वाइवल ऑप्शन’ जैसे सख्त मानदंडों को कवर करते हैं, जो मूल रूप से रोग‑मुक्त भ्रूण के चयन को सीमित करते हैं, परन्तु ‘इच्छित लक्षणों’ की चुनिंदा दुष्टता पर कोई नियंत्रण नहीं है। इस नियामक शून्यावकाश को ‘नीति निर्माण में लापरवाही’ की तरह व्याख्या किया जा सकता है, जहाँ लोगों की स्वायत्तता के बदले उनका ‘वित्तीय शक्ति’ ही न्याय का मानक बन जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रवृत्ति को अनदेखा करना, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक नई चुनौती बन सकता है। डेटा सुरक्षा के प्रश्न, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अभाव, तथा आवश्यक परामर्श सेवाओं की कमी सभी को एक साथ प्रकट करती हैं कि इस तकनीक को ‘सुरक्षित’ कहा जाना अभी बहुत देर है।
सारांशतः, भ्रूण चयन सेवाओं का प्रसार भारत में सामाजिक समानता, नैतिकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के कई कोने को चुनौती दे रहा है। तुरंत व्यापक सार्वजनिक विमर्श, पारदर्शी नियामक ढांचा और न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, वरना यह विज्ञान की प्रगति को सामाजिक असमानता के पुल में बदल देगा।
Published: May 7, 2026