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भोजन सुरक्षा योजना में बदलाव से प्रभावित परिवारों की कहानियों के लिए सरकार ने किया आह्वान
केंद्रीय खाद्य सुरक्षा मंत्रालय ने हाल ही में एक ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया है, जिसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत मिलने वाले सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) लाभों में हुए बदलावों से प्रभावित नागरिक अपनी व्यक्तिगत कहानियां साझा कर सकें। यह कदम तब आया है, जब पिछले तीन महीनों में किराना रेशन की मात्रा, उपस्थिति मानदंड और पात्रता सीमा में क्रमशः कमी लागू की गई थी।
मुख्य रूप से कामकाजी वर्ग, वृद्ध नागरिक, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों वाले परिवार इन कटौतियों से सबसे अधिक पीड़ित हैं। कई समुदायों में तो यह देखा गया है कि पहले से ही सीमित पोषण पूर्ति के दायरे में अब अतिरिक्त अनुपातिक कमी के कारण कुपोषण के खतरे बढ़ गए हैं।
आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि यह संशोधन अनिवार्य बजट प्रतिबद्धताओं को पूरा करने तथा लक्षित वर्गों में संसाधनों के अधिकतम उपयोग हेतु आवश्यक था। परन्तु ग्राउंड स्तर पर यह तर्क कई बार उन लोगों तक नहीं पहुँचा, जिनके पास डिजिटल पहुंच नहीं है, और जो अक्सर पैरों के बल रहने वाले दूरस्थ गांवों में रहते हैं।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया में एक ओर राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से डेटा एकत्र करने का कहा गया है, तो दूसरी ओर फील्ड अधिकारियों की भूमिका को कम करके, केवल मोबाइल अनुप्रयोगों और स्वचालित एल्गोरिदम पर भरोसा कर लिया गया है। इस प्रकार, जब तक तकनीकी संकेतक ठीक दिखते हैं, वास्तविक भूख की घड़ी अनदेखी रहती है – एक ऐसा सिलिकॉन‑आधारित समाधान जो आँकड़ों की काँच-परत में ही रहता है।
समाजिक महत्व को देखते हुए यह मुद्दा केवल पोषण ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ी गहरी विषमताओं को उजागर करता है। यदि इन झटकों को बिना पुनर्मूल्यांकन के जारी रहने दिया गया, तो दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि, स्कूल उपस्थिति में गिरावट और सामाजिक असंतोष की लहरें उत्पन्न हो सकती हैं।
आह्वान के पीछे सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है – नीति में पारदर्शिता और जनसमीक्षा को बढ़ावा देना। परंतु सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया ही वास्तविक जवाबदेही का साधन बन पाएगी, या फिर यह केवल डिजिटल अभिलेखों की चादर में लिपटी एक और प्रशासनिक जाल रहेगा। समय ही बताएगा कि इन कहानियों में छिपी पीड़ा को उत्तरदायी संस्थाओं द्वारा सुधारा जा सकता है या नहीं।
Published: May 6, 2026