बदलते सामाजिक बंधनों पर नया सर्वे: मित्रता के विकास के संकेत और प्रशासनिक प्रतिक्रिया की कमी
राष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान संस्थान (NSSI) द्वारा हालिया सर्वेक्षण ने दिखाया कि भारत में मित्रता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। शहरी और कस्बाई युवाओं ने स्पष्ट रूप से बताया कि पहले सहज लगने वाले संबंध अब ‘एकतरफ़ा’ या ‘दूरस्थ’ महसूस होने लगे हैं, जबकि दोनों पक्षों ने कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं की है।
प्रमुख संकेतों में नियमित मिलन में कमी, बातचीत की सतही होने की प्रवृत्ति, और व्यक्तिगत मूल्यों एवं प्राथमिकताओं में अंतर शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बदलावों का कारण जीवनशैली में तेज़ी से बदलाव, करियर‑उन्मुखता और डिजिटल संचार की प्रबलता है। हालांकि, ये संकेत सामाजिक अस्थिरता के साथ तालमेल बिठाते दिखाई देते हैं, जिससे कई युवाओं में अकेलेपन और तनाव की नई लहर उत्पन्न हो रही है।
मानसिक स्वास्थ्य के नजरिए से यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। लेकिन जहाँ सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार किया है, वहीं इस नीति के कार्यान्वयन में ‘सही दिशा में कदम’ उठाने की बजाय अक्सर कागज़ी काम कर रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के कई अधिकारी इस मुद्दे को ‘व्यक्तिगत चुनाव’ के रूप में वर्गीकृत कर रहे हैं, जिससे वास्तविक समर्थन प्रक्रियाएँ ठहराव में हैं।
निजी क्षेत्र और NGOs ने इस अंतर को पाटने की कोशिश की है। कई गैर‑लाभकारी संगठनों ने मित्रता‑मुक्ति workshops और परामर्श सेवाएँ शुरू की हैं, किंतु उनका कवरेज सीमित है और फंडिंग अक्सर अनिश्चित रहती है। प्रशासन की ओर से एक ही त्वरित घोषणा है कि ‘डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देना' है—जैसे कि एक डिजिटल नोटिस बोर्ड पर एक पृष्ठ भर के शब्दों में।
उभरते सामाजिक परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि व्यक्तिगत संबंधों की बदलती प्रकृति को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसे समझने के लिए नीतियों में स्पष्ट दिशा‑निर्देश, स्कूल‑कॉलेज स्तर पर सामाजिक कौशल प्रशिक्षण, और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में दोस्ती‑सेहत के पहलुओं को शामिल करना अनिवार्य है। तभी सामाजिक बंधन बदलते समय में भी संतुलित और स्वस्थ रह सकेंगे।
Published: May 5, 2026