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Category: समाज

बच्चों की ख़ुशी‑एकाग्रता के लिए रोज़ाना नियम, पर नीति‑कार्यान्वयन में ही है ख़ामी

दुर्भाग्य से, भारतीय परिवारों में तेज़ गति वाले जीवन‑शैली के कारण बच्चे अक्सर अनियमित सुबह, बिखरे हुए अध्ययन समय और असहन्य स्क्रीन‑समय का सामना कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान (ICMR) के एक हालिया सर्वेक्षण में पाया गया कि नियमित दिनचर्या अपनाने वाले 7‑12 वर्ष के बच्चों में पढ़ाई में औसत 15% सुधार और तनाव स्तर में 20% कमी दर्ज की गई। फिर भी, अद्यतन नीति‑निर्माण के बावजूद यह लाभ अभी भी बहुतेरे घरों में कष्टपूर्ण दूरियों से टकरा रहा है।

मुख्य कारणों में से एक है काम‑काज की लम्बी घंटे और सार्वजनिक देखभाल सुविधाओं का अभाव। महानगरों में दो‑तीन पूर्णकालिक काम करने वाले माता‑पिता अक्सर बच्चों को सुबह सुबह ही अपने मोबाइल या टेलीविजन की स्क्रीन के सामने छोड़ देते हैं, जबकि शहरी औद्योगिक क्षेत्रों में स्कूलों का शुरू‑आखिरा समय 9:30 बजे तक देर से होता है, जिससे बच्चे घर‑घर देर‑रात तक जागे रहते हैं।

शिक्षा विभाग ने ‘एकीकृत बाल विकास योजना’ की घोषणा की थी, जिसमें स्कूल‑समय से पहले शैक्षिक खेल, पौष्टिक नाश्ता और नियत नींद‑समय को सुनिश्चित करने की बात कही गई थी। वास्तविकता में, इस योजना की फंडिंग अक्सर स्थानीय निकायों के पास पहुँचने से पहले ही गुम‑शुदा हो जाती है, और स्वयं स्कूलों में पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ का अभाव रहता है। परिणामस्वरूप, कई अभ्यर्थी बच्चों को घर में ही असंरचित समय बिताना पड़ता है—जैसे कि अनियंत्रित मोबाइल उपयोग, असंगत घर के काम, और अनिश्चितता वाले सोने‑जागने के क्रम।

सामाजिक असमानता इस दिशा‑में और गहरी खाई बनाती है। उच्च आय वर्ग के घरों में निजी ट्यूटर्स, व्यवस्थित खेल‑समूह और पेशेवर बाल देखभाल का प्रावधान है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को केवल सार्वजनिक स्कूल की अनियमित कक्षाओं और अस्थिर घर के माहौल का सामना करना पड़ता है। यह अंतर न केवल शैक्षणिक परिणामों को बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।

वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘सकूनभरी सुबह’ अभियान शुरू किया था, जिसका उद्देश्य सुबह के खाने को पौष्टिक बनाना और स्क्रीन‑टाइम को सीमित करना था। परंतु आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है कि अभियान की जानकारी 68% माता‑पिता तक नहीं पहुंची, जबकि शेष 32% ने इसे ‘बहुत जटिल’ और ‘आर्थिक रूप से असंभव’ बताया। इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि नीतियों का रूप‑रेखा और उनकी जमीन‑स्तर पर पहुँच के बीच की दूरी अक्सर व्यावहारिक रूप से अनदेखी रहती है।

व्यवस्था की विफलताओं पर “सख़्त नीति‑निर्धारण पर बहुत चर्चा होती है, पर कार्यान्वयन की ज़िंद‑ग़ी पर कम‑से‑कम तवज्जो दी जाती है” कहे बिना नहीं रह सकता। प्रशासनिक आलस्य और बजट के अलोकप्रिय आवंटन के कारण प्रमुख पहलों—जैसे कि सामुदायिक खेल‑मैदान, सस्ती बाल देखभाल केन्द्र, और स्कूल‑स्थानीय समय‑सारिणी—का विकास अभी भी प्रस्ताव‑पुस्तिका में ही बना हुआ है।

अनुदानों और जागरूकता अभियानों के साथ-साथ, एक ठोस समाधान के रूप में स्थानीय निकायों को अनिवार्य रूप से ‘रोज़ाना नियत समय‑सारिणी’ तैयार करना चाहिए, जिसमें स्कूल‑पहले‑खेल‑पढ़ाई‑आराम‑सोने का क्रम स्पष्ट हो। इससे न सिर्फ बच्चों की शैक्षिक एकाग्रता सुधरेगी, बल्कि उनके स्वास्थ्य‑विकास में भी स्थायी सुधार आएगा। वर्तमान स्थिति में, नीति‑निर्माताओं को अपने “नीति‑पीढ़ी” बालकों को नज़रअंदाज़ करने के बजाय, ‘रूटीनी हस्तक्षेप’ को प्राथमिकता देनी चाहिए—नहीं तो ‘डिजिटल डिस्ट्रैक्शन’ ही उनकी नई पीढ़ी का मुख्य अभ्यर्थी बन जायेगा।

Published: May 4, 2026