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Category: समाज

बच्चों के कैंसर में अंतरराष्ट्रीय मानकों की कमी: भारत की पेडियाट्रिक रेडियोथेरेपी प्रणाली पर सवाल

पैडियाट्रिक रेडियोथेरेपी के क्षेत्र में विश्वविख्यात विशेषज्ञ एन्न बारेट की मौत ने भारत में इस अत्यावश्यक उपचार शाखा की असमर्थता को उजागर किया है। चार दशकों तक उन्होंने बाल कैंसर उपचार के लिए बहु‑विषयक, समग्र दृष्टिकोण को प्रमुखता दी; वहीं भारतीय अस्पतालों में इस मॉडल को अपनाने की गति धीमी—और अक्सर अधूरी—रही।

वर्तमान में भारत में प्रत्येक लाख बच्चे पर लगभग दो ही पेडियाट्रिक रेडियोथेरेपी इकाइयाँ उपलब्ध हैं, जो विश्व औसत की तुलना में दशकों पीछे हैं। कई सरकारी चिकित्सालयों में मात्र एक बुनियादी एक्स‑रे मशीन है, जबकि बारेट के कार्यकाल में विकसित टारगेटेड इमेजिंग और इंटेंसिटी‑मॉड्यूलेशन तकनीकें मानक बन चुकी थीं। इस अंतर का सीधा असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिन्हें उपचार के शुरुआती चरण में ही उचित डोज़ और कम‑टॉक्सिक साइड‑इफ़ेक्ट वाली तकनीक की जरूरत होती है।

शिक्षा क्षेत्र में भी घनिष्ठ खामियाँ स्पष्ट हैं। बारेट ने अपने पाठ्यक्रम से कई पीढ़ियों के डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया; उसके योगदान से लिखी गई पुस्तकें आज तक प्रमुख संदर्भ बनीं। भारतीय मेडिकल कॉलेजों में इन पाठ्यों का अनुवाद या स्थानीयकरण दुर्लभ है, जिससे भविष्य के चिकित्सकों को अंतरराष्ट्रीय मानकों से जुड़ी नवीनतम प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं मिल पाती। परिणामस्वरूप, कई युवा डॉक्टर बाल कैंसर के इलाज में केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही रखते हैं, जबकि व्यावहारिक कौशल की कमी उनके रोगियों के जीवन को जोखिम में डालती है।

सरकारी स्वास्थ्य नीति में भी इस खालीपन को भरने की झलक मिलती है, पर अक्सर यही खालीपन अतिरंजित आँकड़ों और अस्थायी योजनाओं में ही सीमित रहता है। राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम ने 2020 में बाल कैंसर पर विशेष खजाना स्थापित करने की घोषणा की थी, परंतु बजट आवंटन में वह धन मुख्यतः रसायन‑आधारित उपचार और एंकर‑टेस्टिंग के लिए earmarked रहा, जबकि रेडियोथेरेपी बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं देखा गया। इस पर प्रशासकों का यह जवाब देने में देर नहीं लगती कि “सभी रोगियों को समान स्तर की देखभाल मिलनी चाहिए”, जबकि असमानता का मापदंड स्पष्ट है।

भौगोलिक असमानता भी इस समस्या को गहरा करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर के शुरुआती लक्षणों की पहचान ही अक्सर नहीं होती; जब पता चलता है, तो परिचर्या के लिए शहरी केंद्रों की यात्रा करना पड़ता है, जहाँ ही कुछ ही अस्पतालों में पेडियाट्रिक रेडियोथेरेपी की सुविधा उपलब्ध है। यही कारण है कि ग्रामीण बच्चों में देर से निदान और कम उपचार सफलता दर देखी जाती है।

इन चुनौतियों का समाधान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस नीति‑निर्माण और संस्थागत जवाबदेही में निहित है। विशेषज्ञों ने लगातार कहा है कि पेडियाट्रिक रेडियोथेरेपी के लिए एक राष्ट्रीय प्रशिक्षण नेटवर्क, आधुनिक इमेजिंग उपकरणों के लिए विशेष फंड, और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पाठ्यक्रम विकास अनिवार्य है। इसके अलावा, सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च के प्रतिशत को बढ़ाकर बच्चे‑के‑कैंसर‑से‑जुड़ी‑प्रौद्योगिकी में निवेश करना, एक योग्य प्रशासनिक लापरवाही को चुनौती देगा।

एन्न बारेट की विरासत इस बात की याद दिलाती है कि विज्ञान‑आधारित, बहु‑विषयक देखभाल संभव है—यदि नीति‑निर्माता और स्वास्थ्य प्रशासन इसे “शौकिया” नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता मानें। भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए समय आ गया है कि वह अपने बच्चों को वही देखभाल दे, जो विश्व स्तर पर उपलब्ध है, न कि केवल टेबल पर रखी हुई सूची।

Published: May 5, 2026