बच्चों के आत्म‑सम्मान को बढ़ाने वाले पाँच वाक्यांशों पर सरकारी नई गाइडलाइन
राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस हफ़्ते पाँच सटीक वाक्यांशों को आधार बनाकर एक राष्ट्रीय पेरेंटिंग गाइडलाइन जारी की, जिसका उद्देश्य छोटे‑बच्चों के आत्म‑सम्मान को सुदृढ़ करना है। ये वाक्यांश – “मैं तुम पर भरोसा करता/करती हूँ”, “तुम सही रास्ता चुन रहे/रही हो”, “तुम्हारी कोशिश सराहनीय है”, “तुम्हारी भावना महत्वपूर्ण है” और “तुम्हारी रचनात्मकता को मैं देख रहा/रही हूँ” – को विशेषज्ञों के अनुसार ‘शांत, विशिष्ट और निरंतर’ संवाद के रूप में परिभाषित किया गया है।
देश भर में बढ़ती शिक्षा‑संबंधी दबाव, सामाजिक असमानता और डिजिटल दुनिया की तेज़ी से बच्चों की आत्म‑मूल्यांकन पर असर डाल रहे हैं। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में वार्षिक रूप से लगभग 30 % प्राथमिक विद्यार्थी के मनोवैज्ञानिक तनाव स्तर में वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें विशेषकर ग्रामीण, शहरी‑स्लम और वर्ग‑आधारित असमानताओं का पुल बना है। इस पृष्ठभूमि में सकारात्मक भाषा को एक सस्ते लेकिन प्रभावी समाधान के रूप में पेश किया गया है।
गाइडलाइन के तहत केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर फ़्लायर, डिजिटल वीडियो और सामुदायिक कार्यशालाओं के माध्यम से यह संदेश घर‑घर पहुँचाने का प्रस्ताव है। परन्तु कई सामाजिक विज्ञानियों ने इसे ‘सैद्धांतिक परिपूर्णता में लिपटी हुई, लेकिन व्यावहारिक तक पहुँच में खटकती हुई’ कहा है। विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी, स्वास्थ्यकर्मियों की प्रशिक्षण में अंतर और विद्यालयों में मनोवैज्ञानिक संसाधनों की कमी इस योजना की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है।
बच्चों के अधिकार एवं मनो‑स्वास्थ्य को लेकर चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन ने इस कदम को एक सकारात्मक संकेत मानते हुए स्वागत किया, लेकिन यह भी कहा कि केवल ‘पाँच वाक्यांश’ को रसोई में रखने से ‘भोजन’ नहीं बनता। विशेषज्ञों के अनुसार, पक्ष‑पक्षीय कार्यशालाओं, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों और माता‑पिता सहायता समूहों के साथ इस गाइडलाइन को जोड़ना आवश्यक है, ताकि शब्दों को व्यवहार में बदला जा सके।
सरकार की इस पहल को विनम्र व्यंग्य के साथ देखना भी चाहिये: “अब मोबाइल स्क्रीन पर पॉप‑अप एड के जैसे ये वाक्यांश भी हर सुबह आपके नज़र में आएँगे, बशर्ते नेटवर्क उपलब्ध हो।” यह संकेत देता है कि नीतियों की सफलता केवल ‘डिज़ाइन’ में नहीं, बल्कि ‘डिलीवरी’ में निहित है। यदि ये पाँच वाक्यांश सही चैनलों से पहुँचें, तो भविष्य के विद्यार्थियों में आत्म‑विश्वास की ‘बजट’ घटेगी और शिक्षा‑संबंधी असमानताएँ कम होंगी। अंततः, यह गाइडलाइन बच्चों के मनोविज्ञान में एक छोटा, मगर संभावित, परिवर्तन की चाबी हो सकती है – बशर्ते प्रशासनिक जिम्मेदारी और सामुदायिक भागीदारी साथ‑साथ चलें।
Published: May 4, 2026