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बाल विकास में प्रेम, सीमाएँ और सम्मान के मूल सिद्धांतों को स्कूल पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की आवश्यकता
भारत के कई भागों में बाल कल्याण के लिए जागरूकता बढ़ रही है, परन्तु शिक्षा प्रणाली अभी भी मुख्य रूप से शैक्षणिक प्रदर्शन पर केंद्रित है। असली जीवन कौशल—जैसे प्रेम की स्वस्थ अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत सीमाओं का निर्धारण, तथा दूसरों के प्रति सम्मान—पर पर्याप्त निर्देश नहीं दिया जाता। यह अंतर न केवल बच्चों की भावनात्मक स्थिरता को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक असमानता और साइबर‑बुलिंग जैसे समस्याओं को भी बढ़ाता है।
विकसित देशों में बाल मनोवैज्ञानिकों और शैक्षिक नीति निर्माताओं ने हाल ही में छह मुख्य सिद्धांतों की रूपरेखा तैयार की है, जिन्हें प्री‑स्कूल से माध्यमिक स्तर तक क्रमबद्ध रूप से सिखाया जाना चाहिए:
- अपने आप से प्रेम करना सीखना, ताकि आत्म‑सम्बंधी स्वास्थ्य बनी रहे।
- दूसरों के प्रति सच्चा प्रेम दाखिल करना, बिना स्वार्थ के।
- व्यक्तिगत सीमाएँ स्थापित करना और उनका सम्मान करवाना।
- दूसरों की सीमाओं को समझना और उनका उल्लंघन न करना।
- परस्पर सम्मान की संस्कृति का निर्माण, चाहे वर्ग, लिंग या जाति कोई भी हो।
- समझौता और संवाद के माध्यम से संघर्ष समाधान की आदत डालना।
इन सिद्धांतों को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में औपचारिक रूप से शामिल करने हेतु भारत सरकार ने इस साल शिक्षा निदेशकालय को ‘बाल भावनात्मक शिक्षण’ (Child Emotional Education – CEE) पहल का मसौदा तैयार करने का निर्देश दिया। हालांकि, प्राइसिंग के बाद कई राज्य शिक्षण विभागों ने यह माना है कि मौजूदा पाठ्यक्रम के अतिरिक्त यह भार संकुल शिक्षकों के लिये अतिरिक्त बोझ बन सकता है। इस पर शिक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि केवल औपचारिक दस्तावेज़ों से बदलाव नहीं होगा—प्रशिक्षण, निगरानी और मूल्यांकन प्रणाली की गंभीर कमी प्रशासनिक उपेक्षा को उजागर करती है।
जनता का इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया मिश्रित है। शहरी वर्ग के अभिभावकों ने इसे ‘अवश्य आवश्यक’ कहा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से माता‑पिता अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य और शैक्षणिक सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं, जिससे नई सामग्री पर ध्यान देना कठिन हो रहा है। इस असमानता को देख कर कुछ सामाजिक संगठनों ने आधी‑समीक्षा एवं सामुदायिक कार्यशालाओं के माध्यम से ‘समीपस्थ शिक्षा’ प्रदान करने का प्रस्ताव रखा है, जो नीति की अनुपालना के अंतर को कम कर सकता है।
जबकि नीति निर्माताओं का यह दावा है कि ‘भावनात्मक साक्षरता’ को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता दी जाएगी, वास्तविक प्रभाव का आकलन अभी बाकी है। पिछले दो वर्षों में ही कई राज्यों ने बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की शिकायतों को अनदेखा कर, गैर‑समर्थित स्कूलों में शारीरिक दंड जारी रखा, जिससे यह सवाल उठता है कि नई सिद्धांतों को ‘कागज पर’ ही रहने दिया जाएगा या उनका व्यावहारिक कार्यान्वयन भी होगा।
संक्षेप में, प्रेम, सीमाएँ और सम्मान के मूल सिद्धांतों को शैक्षिक ढांचे में सम्मिलित करने की बात केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है। यदि प्रशासन केवल ‘सूत्र’ बनाकर रख देगा, तो बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को सुदृढ़ करने की कोशिश व्यर्थ रहीगी; जबकि ठोस प्रशिक्षण, निरंतर निगरानी और राज्य‑स्तरीय वित्तीय सहयोग से ही इस नीति को कार्यशील बनाना संभव है।
Published: May 7, 2026