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बिल्ली एलिश ने टौरेटा टिक्स को दबाने के अपने संघर्ष का खुलासा, भारत में रोगी समर्थन की खामियों को उजागर किया
अमेरिका की प्रसिद्ध गायक-गीतकार बिल्ली एलिश ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि वह टौरेटा सिंड्रोम (TS) के टिक्स को दमन करने के लिये "सब कुछ कर रही" हैं। 11 वर्ष की आयु में इस न्यूरो‑स्नायु रोग का निदान होने के बाद से उन्होंने अपने व्यवहार को नियंत्रित करने में निरंतर संघर्ष किया है, और यह स्वीकार किया कि सामाजिक समझ की कमी अक्सर उन्हें निराश करती है।
बिल्ली का यह व्यक्तिगत बयान वैश्विक स्तर पर टौरेटा रोगियों की मौन पीड़ा को उजागर करता है, और भारत जैसे देशों में स्थित बुनियादी समस्याओं पर भी प्रकाश डालता है। भारत में टौरेटा रोग की सटीक संख्या अनिश्चित ही है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित सर्वेक्षण या रोगी रजिस्टर नहीं हैं। अनुमानित आंकड़े दर्शाते हैं कि लाखों लोग इस लक्षणी स्थिति को लेकर असहाय हैं, जबकि अधिकांश परिवार इसे सामाजिक कलंक के रूप में देख कर छुपा देते हैं।
शिक्षा प्रणाली में इस रोग को समझने की तत्परता नज़रअंदाज़ की जा रही है। कई विद्यालयों में टिक वाले छात्रों को अनुशासनात्मक कार्यवाही या यहाँ तक कि बहिष्करण का सामना करना पड़ता है, जबकि अंतर्निहित न्यूरोलॉजिकल कारण पर कोई विचार नहीं किया जाता। विशेष शिक्षा पोर्टल या अनुकूलन के लिये स्पष्ट मानक बंद नहीं हैं, और शिक्षकों को केवल सामान्य चेतावनियों के साथ ही इस समस्या से निपटना पड़ता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी जड़ता स्पष्ट है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति में टौरेटा को एक अलग वर्ग के रूप में मान्यता दी गई है, परन्तु व्यवहार्य उपचार केंद्र, बहु-आश्रित क्लिनिक या राज्य प्रायोजित निवारक कार्यक्रमों का अभाव बना हुआ है। अक्सर रोगी को थकान‑भरी यात्रा करके बड़े शहरी अस्पतालों में पहुँचाना पड़ता है, जहाँ विशेषज्ञों की उपलब्धता भी सीमित रहती है। इस प्रणाली की खामियों पर व्यंग्य यह है कि एक विदेशी पॉप आईकन को अपनी कठिनाइयों को सार्वजनिक मंच पर लाना पड़ता है, जबकि हमारे अपने नीति‑निर्माताओं को वही समझ नहीं मिलती।
सरकारी पहल की कमी केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। सार्वजनिक जागरूकता अभियानों की कमी के कारण टौरेटा रोगियों को सामाजिक बहिष्कार, रोजगार में बाधाएं और आजीविका में निरंतर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ व्यापक स्वास्थ्य कवरेज का वादा करती हैं, परन्तु न्यूरोडिजेनेरेटिव एवं न्यूरोविकृतिक रोगों के लिये विशिष्ट बजट या प्रोत्साहन नहीं दिया गया है।
बिल्ली एलिश की इस बात को सुनकर यह स्पष्ट होता है कि उपचार की खोज में व्यक्तिगत प्रयत्नों का बायलॉजिकल सीमा तक सहारा होना चाहिए, न कि सामाजिक उदासीनता। भारत में आवश्यक है कि नीति‑निर्माता टौरेटा जैसे न्यूरोलॉजिकल विकारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्राथमिक एजेंडे में रखें, स्कूलों में संवेदनशीलता प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाएं, तथा राष्ट्रीय रोगी रजिस्ट्री स्थापित कर रोगियों को सस्ती, सुलभ और विशेषज्ञ‑निर्देशित चिकित्सा उपलब्ध कराएँ। तभी इस लाखों की अनकही आवाज़ को सुनना संभव हो सकेगा।
Published: May 7, 2026