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Category: समाज

बॉबी दुविधा: एक अमेरिकी डॉल ने भारतीय बचपन में लिंग‑भूमिका का पुनःआंकलन किया

1959 में रुथ हैंडलर ने अपनी बेटी को कागज़ की गुड़ियों के साथ खेलते देख एक सरुचिपूर्ण अंतर नोट किया: बाजार में वयस्क महिला आकृति वाली कोई खिलौना नहीं था। इस अंतर को भरते हुए उन्होंने “बार्बी” नामक डॉल का निर्माण किया, जिसे तब से सिर्फ़ सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि करियर‑कन्विक्शन का साधन माना गया।

भारत में इस डॉल का प्रवेश 1970 के दशक में हुआ, और जल्द ही इसे कई वर्गों के बच्चों की अलमारी में जगह मिली। बार्बी ने न केवल उपभोक्ता वस्तु के रूप में बल्कि सामाजिक द्रष्टिकोण के उपकरण के रूप में कार्य किया। लड़कियों को डॉक्टर, पायलट, वैज्ञानिक या एवी ड्राइवर जैसी भूमिकाएँ अपनाने का मंच मिला – एक समय जब भारतीय स्कूल‑पुस्तकों में अक्सर महिला पात्र ‘घरेलू’ तक सीमित रहते थे।

परंतु इस प्रगति के दोधारी तलवार की बराबर ही घुटन भी हुई। कई अध्ययनों ने दिखाया कि बार्बी जैसी ‘परिपूर्ण’ शारीरिक छवि बच्चों में असमान सौंदर्य मानदंड स्थापित कर सकती है, जिससे शारीरिक आत्मविश्वास में गिरावट और शरीर‑छवि विकार की आशंका बढ़ती है। इस पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य मिशन ने कई साल पहले ही चेतावनी जारी की, परन्तु सरकारी स्कूलों में खिलौना नीति में स्पष्ट प्रावधान अभी भी अनुपस्थित हैं।

शिक्षा विभाग के ‘समावेशी पाठ्यक्रम’ के दायरे में केवल पाठ्य सामग्री की समानता को प्राथमिकता दी गई है, जबकि ‘बाहर के साधन’ जैसे खिलौनों पर कोई नियामक कदम नहीं उठाया गया। परिणामस्वरूप, सार्वजनिक एवं सरकारी स्कूलों में अक्सर सस्ते स्थानीय निर्माण के खिलौने ही उपलब्ध होते हैं, जबकि निजी संस्थानों में महँगी आयातित बार्बी और उसके विविध संस्करण एक सामाजिक वर्गीय विभाजन को और गहरा करते हैं।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया भी यथास्थिति में ही सीमित है। बाल अधिकार आयोग ने 2023 में ‘जेंडर‑बायस्ड खेल सामग्री पर अनुसंधान’ की मांग की, लेकिन बजट में कोई आवंटन नहीं, और कार्यकारी आदेश भी नहीं आया। जहाँ से यह स्पष्ट है कि नीति‑निर्माताओं ने बाजार की ‘बेस्ट‑सेलर’ को सामाजिक सुधार के वैध उपकरण के रूप में नहीं पहचाना, बल्कि केवल उपभोक्ता वस्तु माना।

इस असमानता को ठीक करने के लिए दो‑तीन उपाय सामने हैं: प्रथम, राष्ट्रीय स्तर पर ‘समानता‑संज्ञान खिलौना मानक’ बनाना, जिससे प्रत्येक शैक्षिक संस्थान में बहु‑लिंग, बहु‑पेशेवर विकल्प वाले खिलौनों की न्यूनतम मात्रा निर्धारित हो; द्वितीय, सार्वजनिक‑निजी साझेदारी के जरिए सस्ती, स्थानीय रूप से निर्मित, सामाजिक‑शिक्षा‑उन्मुख खिलौना लाइब्रेरी स्थापित करना; तथा तृतीय, प्रचलित निहितार्थी विज्ञापनों को सख्त नियमन के दायरे में लाना, ताकि ‘परिपूर्ण शरीर’ का स्वरूप बच्चों तक अवास्तविक रूप से न पहुँचे।

सारांश में, रुथ हैंडलर की एक साधारण अवलोकन से उत्पन्न डॉल ने भारतीय लिंग‑धारणाओं में बदलाव की नई राहें खोलीं, परन्तु नीति‑निर्माताओं की चुप्पी और असंगत नियामक ढाँचा इसे एक सामाजिक प्रश्नचिन्ह बना देता है। यदि प्रशासन इस ‘खिलौने’ को केवल व्यावसायिक आय नहीं, बल्कि शिक्षा‑समानता का साधन मान ले, तभी भारतीय बचपन सच्चे अर्थ में विविधता और स्वतंत्रता के साथ खिल सकेगा।

Published: May 4, 2026