बुजुर्गों की सीख को अनसुना करने वाली नीतियों पर प्रश्न: धौनी के सुझाव में छिपा सामाजिक संदेश
भारत में उम्र के साथ बढ़ती सामाजिक दूरी, आरक्षित अधिकारों की अनदेखी और नीतिगत अंधधुंधी का एक माहौल बना हुआ है। इस पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर एम. एस. धौनी ने "बुजुर्गों की सलाह सुनें, न कि क्योंकि वे हमेशा सही होते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने गलतियों से सीख ली है" जैसी सलाह दी, जो केवल खेल की दुनिया तक सीमित नहीं रह सकती। यह संदेश सामाजिक‑आधारित नीतियों, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में बुजुर्गों के अनुभव को व्यवस्थित रूप से जोड़ने के जरूरी प्रश्न उठाता है।
देश के कई क्षेत्रों में वृद्ध जनसंख्या का अनुपात निरंतर बढ़ रहा है, परन्तु सार्वजनिक सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व अब भी अनुपातहीन है। कई ग्राम पंचायतें बुजुर्गों के ज्ञान को दस्तावेज़ीकरण के बजाय "पुराने समय की बात" समझकर अनदेखा करती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में, स्कूल पाठ्यक्रम में जीवन‑पर्यावरणीय ज्ञान और पारिवारिक इतिहास को सम्मिलित करने का मौलिक पहलू अक्सर नीतिनिर्माताओं के एजेंडा से बाहर रह जाता है।
सामाजिक असमानता के प्रकोप में यह और अधिक स्पष्ट हो जाता है कि गरीब और किनारे पर रहने वाले बुजुर्गों के पास स्वास्थ्य सुविधाओं, पोषण और मानवीय सम्मान का अधिकार साधनों से वंचित है। मध्यप्रदेश के एक दूरस्थ गाँव में, एक 78 वर्षीय किसान ने बताया कि उसने अपने जीवन के 30 साल कृषि‑विफलताओं से सीखा है, फिर भी सरकारी कृषि योजना में उसकी कहानी किसी भी रूप में नहीं ली गई। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के एक सरकारी अस्पताल में, एक 72‑वर्षीय महिला मरीज ने अपने पुरानी दवाओं के साइड‑इफ़ेक्ट से सीखकर नए रोगियों को चेतावनी देने की कोशिश की, पर नर्सिंग स्टाफ ने उसे बस "बुजुर्गों की बातें" मान कर अनदेखा किया।
इन मामलों पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर उदासीन रहती है। कुछ राज्यों ने तो "बुजुर्गों के ज्ञान को डिजिटल लाइब्रेरी में संग्रहित करने" का हल्का‑फुल्का प्रस्ताव लाया है, पर टेंडर प्रक्रिया, डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर और सटीक मानवीय संसाधन की कमी के कारण वह प्रस्ताव कागज़ पर ही रह जाता है। व्यंग्य यह है कि वही राजस्व विभाग, जो हर साल करोड़ों का बजट मुक्त करता है, वह बजट इस मूल्यवान रिपोर्टिंग को दे ही नहीं पा रहा।
छत्रछाया के इन गड़बड़ियों का वास्तविक प्रभाव यह है कि युवा वर्ग उन मौकों से वंचित हो जाता है जहाँ वे बुजुर्गों की गलतियों से सीखा हुआ ज्ञान अपनी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रगति में लागू कर सकते थे। स्वास्थ्य‑साक्षरता, रोग‑प्रतिरोधक क्षमता और कृषि‑उत्पादकता में संभावित सुधारों के लिए यह एक मौलिक संसाधन बन सकता था।
वर्तमान में कुछ प्रगति के संकेत दिख रहे हैं। उत्तराखंड ने "वरिष्ठ नागरिक सलाहकार समिति" बनाकर उसके तहत स्थानीय विकास योजनाओं में बुजुर्ग प्रतिनिधियों को मान्यताप्राप्त स्थान दिया है। लेकिन यह पहल अभी भी चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और राजनीतिक हस्तक्षेप से जूझ रही है।
धौनी की सलाह, यदि नीतिनिर्माण तक सीमित नहीं रखी जाए तो, सामाजिक ढाँचे को पुनः परिभाषित कर सकती है। एक तरफ़ बुजुर्गों की व्यक्तिगत कहानियों को राष्ट्रीय डेटा पोर्टल में जोड़ना, दूसरी ओऱ स्थानीय शैक्षणिक संस्थानों में "जीवन‑परिचय कार्यशालाएँ" आयोजित कर उनका ज्ञान विद्यार्थियों तक पहुँचाना, दोनो ही कदम प्रशासनिक अलसापन के पहाड़ को ढीला करने में सहायक हो सकते हैं।
अंत में यह कहा जा सकता है कि बुजुर्गों के अनुभव को केवल "समय‑से‑बीतता" नहीं, बल्कि "ऐतिहासिक‑संकट‑परिहारक" मानना ही नीतियों की विफलता को बाधित कर सकता है। यदि प्रशासनिक इंद्रधनुष में थोड़ी सी समझदारी का रंग घोला जाए, तो धौनी के शब्द केवल प्रेरणादायक नहीं रहकर, भारत के सामाजिक विकास का ठोस पथ बन सकता है।
Published: May 5, 2026