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Category: समाज

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बीजिंग में अरघची का संदेश: हर्मुज जलडमरूमध्य की खुली राह में चीन की भूमिका, भारत के हित पर असर

बीजिंग में इरान के वरिष्ठ राजनयिक अरघची ने चीन के साथ हुए वार्ता में कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन दोनों का हर्मुज जलडमरूमध्य को शीघ्र खोलने में समान दिलचस्पी है। इस खुली राह को संभावित शांति की दिशा के रूप में देखते हुए विश्लेषकों ने कहा कि द्विपक्षीय सहयोग से यू‑एस‑ईरान तनाव में कमी आ सकती है।

हर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में से एक है। लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तैलीय आपूर्ति इस संकरी जल पथ से गुजरती है, और भारत का लगभग सात‑सात दर्जन मिलियन बैरल तेल दैनिक आयात इसी मार्ग से होता है। इसलिए इस जलडमरूमध्य की अस्थायी या स्थायी बंदी भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डालती है। तेल की कीमतों में उछाल से ग्राम पंचायतों तक के गैस साक्षरता कार्यक्रम, शहरी बसों की ईंधन लागत और औद्योगिक उद्ध्यमों की उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। अंतर्दृष्टि से देखा जाए तो यह स्वास्थ्य, शिक्षा एवं बेसिक सार्वजनिक सेवाओं पर एक बड़ा बोझ बन जाता है।

दूसरी ओर, भारतीय प्रशासन ने इस अंतरराष्ट्रीय तनाव को लेकर सक्रिय कूटनीतिक पहलें कम ही दिखाई हैं। विदेश विभाग की त्वरित जवाबदेही टीम का गठन समय पर नहीं हुआ, और केंद्रीय सरकार ने तेल आयात के वैकल्पिक मार्गों की संभावनाओं पर सार्वजनिक बहस नहीं उठायी। ऐसा लगता है कि बड़े देशों की “रिप्पल इफ़ेक्ट” को रोकने की जिम्मेदारी को केवल “संकट में पहुँचे तो बाथरूम की लाइट जलाओ” की नीति के तहत सौंप दिया गया है।

नीति‑निर्माताओं ने कई बार विविध ऊर्जा स्रोतों के निवेश की घोषणा की, पर अक्सर वह घोषणा बजट के अधूरे बँक खाते में ही फँस जाती है। जब हर्मुज की बंदी के कारण तेल कीमतें तेज़ी से बढ़ती हैं, तो केंद्र के ‘मूल्य नियंत्रण’ एवं ‘सुब्सिडी’ के तोते के बजाय सामान्य नागरिक को कीमतों का बोझ सहना पड़ता है। इस स्थिति में शहरी की मध्यम वर्गीय परिवारों को सस्ते भोजन और स्वास्थ्य देखभाल पर कटौती करनी पड़ती है, जबकि ग्राम्य क्षेत्रों में विद्यालयों के निर्माण पर फंड का आवंटन स्थिर रहता है।

विश्लेषकों ने कहा, अगर चीन और यूएस मिलकर हर्मुज को खोलने के लिए ‘साझा मंच’ बनाते हैं, तो भारत को भी अपने ‘डिप्लोमैटिक इंटीरियर’ को मजबूत करना होगा। विशेष रूप से, भारत को मध्य‑पूर्व के दो बड़े महाशक्तियों के खेल में मध्यस्थता की भूमिका अपनानी चाहिए, न कि केवल उनके बीच फँसे ‘विचोले’ बनने की। यह नीति‑परिवर्तन न केवल तेल आपूर्ति के जोखिम को कम करेगा, बल्कि भारतीय नागरिकों को स्वास्थ्य, शिक्षा एवं आवश्यक सार्वजनिक सुविधाओं में स्थिरता भी प्रदान करेगा।

सारांश में, हर्मुज जलडमरूमध्य का पुनः खुलना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की ओर एक संभावित कदम है, पर इसका प्रभाव भारत में सीधे नागरिक जीवन से जुड़ा है। प्रशासन को अब शब्द‑जाल से हट कर ठोस कूटनीति, विविध ऊर्जा नीति और सार्वजनिक जवाबदेही पर ध्यान देना चाहिए, ताकि विश्व के बड़े खिलाड़ियों की बातचीत में भारत केवल दर्शक न रह जाए, बल्कि सक्रिय भागीदार बन सके।

Published: May 6, 2026