पसीने से जुड़ी ऊर्जा तकनीक पर भारतीय वैज्ञानिकों की जंग, नीति‑निर्माताओं की उदासीनता
एक प्रयोगशाला में गूँजते हुए पसीने की बूंदों से जुड़ी द्वी‑धातु इलेक्ट्रोड की बीटीसंकेतक‑संचालन क्षमता, भारत के कई शोध संस्थानों में अब गंभीर चर्चा का विषय बन गई है। वैज्ञानिकों ने बताया कि मानव पसीना, जिसमें लवण, लैक्टिक एसिड और पोषक तत्व होते हैं, उसे छोटे‑छोटे इलेक्ट्रिक सेल में संग्रहित कर, ब्लूटूथ या अन्य लो‑पावर संचार उपकरणों को निरंतर शक्ति मिल सकती है।
तकनीकी दृष्टि से यह प्रस्ताव आशाजनक है: ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य मॉनिटरिंग पहनने योग्य उपकरणों को बैटरी‑परिवर्तन के बिना चलाना, निखरते शहरी कैंपसों में छात्रों को लगातार जुड़ाव प्रदान करना, तथा स्वच्छता एवं जल संरक्षण के साथ ऊर्जा उत्पन्न करना। लेकिन वास्तविकता में इस नवाचार को न तो पर्याप्त वित्तीय सहायता मिल रही है, न ही स्पष्ट नीति‑निर्देश।
देश के प्रमुख तकनीकी विश्वविद्यालयों के प्रमुखों ने बताया कि प्रारंभिक प्रोटोटाइप को लैब परीक्षण में 70‑80 प्रतिशत दक्षता मिल रही है, फिर भी सरकारी फ़ंडिंग की कसर ने आगे‑आगे परीक्षण को रोक दिया है। “जब तक विज्ञान मंत्रालय ‘स्वस्थ भारत’ के बैनर के नीचे पसीने को ऊर्जा स्रोत मानने की दिशा में आधिकारिक मान्यता नहीं देता, तब तक इस क्षेत्र में कोई वास्तविक प्रगति नहीं देखी जा सकती,” एक वरिष्ठ शोधकर्ता ने कहा।
यहाँ तक कि राष्ट्रीय विज्ञान परिषद द्वारा हाल ही में जारी किए गए ग्रांट‑फ़ॉर्म में भी इस प्रकार की बायो‑इलेक्ट्रिक प्रौद्योगिकी को ‘अनुपयुक्त’ कहा गया, जिससे कई प्रयोगशालाएँ अपने शोध को निजी तौर पर जारी रखने के लिए निवेशकों की तलाश में लग गई हैं। निजी कोष से जुड़ी जोखिम‑भरी इस दिशा में अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक‑निजी साझेदारी मॉडल नहीं तैयार हुआ है।
समाज की व्यापक वर्गीय असमानताएँ भी इस मुद्दे को जटिल बनाती हैं। गरीब तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, जिनकी शारीरिक क्रिया‑कलाप अधिक होती है, वह कदम‑दर‑कदम पसीने की प्रचुर मात्रा उत्पन्न करते हैं। यदि इस ऊर्जा को प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके तो उनका स्वास्थ्य निरीक्षण, मातृ‑शिशु देखभाल, तथा शुरुआती रोग पहचान में बड़ी मदद मिल सकती है। परंतु जब तक नीति‑निर्माताओं का ध्यान इस संभावित ‘स्रोत’ पर नहीं जाता, तब तक वह शक्ति केवल प्रयोगशालाओं की काँच की बोतलों में ही रहती है।
शिक्षा विभाग ने भी इस तकनीक को ‘भविष्य की ऊर्जा’ के रूप में शामिल करने की बात कही, परंतु राज्य‑स्तर पर इस दिशा में कोई पाठ्यक्रम या प्रयोगशाला सुविधा नहीं है। छात्रों को इस विषय पर शोध करने के लिए बाहर की संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे सामाजिक‑आर्थिक विभाजन और गहरा हो जाता है।
भ्रष्टाचार और नौकरशाही के जाल ने भी इस नवाचार के मार्ग को कठिन बना रखा है। कुछ राज्य में विभागीय अनुमोदन के लिये अनावश्यक ‘प्रोटोकॉल’ लागू किए जा रहे हैं, जिसके कारण एक-त्रि‑तीन महीनों का इंतज़ार भी आवश्यक हो गया है। “पर्याप्त तकनीकी समर्थन मिलने के बाद, हमें दिखायी देता है कि अधिकांश सरकारी दस्तावेज़ीकरण में ‘पानी‑पर‑बिजली’ के साथ-साथ ‘पसीना‑पर‑बिजली’ को भी ‘विचार्य योग्य’ माना गया है,” एक स्थानीय अधिकारी ने व्यंग्यपूर्वक कहा।
सार्वजनिक प्रतिक्रिया में स्पष्ट है कि जनता इस दिशा में उम्मीद रखती है, परंतु भरोसा तब तक नहीं बन पाता जब तक सरकार स्पष्ट समय‑सीमा, फंडिंग मॉडल और निगरानी तंत्र नहीं स्थापित करती। सोशल मीडिया पर कई नागरिक ने कहा, “अगर पसीने से बिजली बनती है, तो क्यों न हमारे स्कूलों के बंगलों की छत पर भी इस तकनीक को स्थापित किया जाए?”
निष्कर्षतः, पसीने से ऊर्जा उत्पन्न करने की वैज्ञानिक खोज भारत में कई सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकती है—स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा तक पहुँच, तथा नवीकरणीय ऊर्जा के स्वरूप में। परंतु नीतिगत अनिच्छा, निधि‑अभाव, और प्रशासनिक कागज़ी कार्यवाही इन संभावनाओं को धीरे-धीरे निचोड़ रही हैं। जब तक सरकार ‘बिजली के साथ पसीना’ को केवल प्रयोगशालाओं के प्रायोगिक चरण में नहीं रखती, तब तक इस तकनीक का वास्तविक सामाजिक प्रभाव केवल कागज़ पर ही रहेगा।
Published: May 4, 2026