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Category: समाज

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परम्परागत कोवलपुरी मटन रेसिपी की मौन आपदा: सांस्कृतिक विरासत और स्वास्थ्य‑सुरक्षा पर प्रशासनिक चुप्पी

कोवलपुरि में पीढ़ियों से पलाई जाती मटन रेसिपी, जिसमें तेज़ मसाले, धुएँ‑धारित धीर‑पकाने की विधि और स्थानीय जड़ी‑बूटी‑संतुलन शामिल है, अब बड़े‑बड़े मेन्यू में सुस्ती‑से दिखती है। पर्यटन‑बॉयलर और फास्ट‑फूड के विस्तार ने इस धनी पाक‑परम्परा को धीरे‑धीरे मार दिया है।

समुदाय के बुजुर्गों के अनुसार, यह रेसिपी न केवल स्थानीय स्वाद को परिभाषित करती है, बल्कि तभी प्रोटीन‑समृद्ध मांस को हल्की‑हल्की जलन‑रहित बनाने में मदद करती है, जिससे स्वास्थ्य‑सम्बंधी जटिलताएँ कम रहती हैं। लेकिन आज‑कल युवा वर्ग तेज़ी‑से तैयार खाने को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे मोटापा, हाइपर‑टेनशन और उच्च‑कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों में वृद्धि देखी जा रही है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह व्यंजन एक जीवंत दस्तावेज़ है जो स्थानीय कृषि‑प्रणाली, जल‑संसाधन प्रबंधन और सामाजिक समारोहों को प्रतिबिंबित करता है। फिर भी, राष्ट्रीय सांस्कृतिक संरक्षण नीति में इस प्रकार के क्षेत्रीय व्यंजनों को समर्थन देने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। बजट‑वर्ष 2026‑27 में ‘परम्परागत कला’ के तहत केवल नृत्य‑और संगीत कार्यक्रमों को ही अनुदान मिला, जबकि व्यंजन‑आधारित वार्षिक मेलों की कोई स्थिति नहीं बनी।

शिक्षा विभाग की ओर से भी कोई ठोस कदम नहीं दिखा। जबकि कई राज्यों ने स्कूल‑किचन में स्थानीय भोजन को शामिल करने की घोषणा की थी, कोवलपुरि जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में यह योजना अभी भी कागज़ पर ही है। परिणामस्वरूप, ग्रामीण छात्र शहर के फ़ास्ट‑फ़ूड पोषण परिप्रेक्ष्य से ही अपने खाने‑पीने की आदतें बना रहे हैं।

नागरिक सुविधाओं की चर्चा करें तो, सार्वजनिक स्थानों में सामुदायिक रसोई या कुकिंग‑वॉर्कशॉप की कमी स्पष्ट है। कई ग्राम पंचायतों ने तो इस मुद्दे को ‘पर्याप्त बजट नहीं’ की वजह से टाल दिया है—जैसे कि सरकारी क्षेत्र ने हमेशा कहा है, ‘बाजे‑बाजे में बजट नहीं, तो बक़ी काम कब हो पाएगा?’

संबंधित प्रशासन ने अब तक केवल टोक-टोक बयान दिए हैं—‘परम्परागत व्यंजन हमारा सांस्कृतिक धरोहर है, हम इसे संरक्षित करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे’। इस वाक्य को कई नागरिक संगठनों ने ‘विचारशील जवाब’ कह कर परख लिया है, क्योंकि वास्तविक कार्य योजना, निधि आवंटन या समय‑सीमा कभी सामने नहीं आई।

परिणामस्वरूप, कोवलपुरि की यह विशिष्ट मटन रेसिपी न केवल अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रही है, बल्कि वह स्वास्थ्य‑सुरक्षा, शैक्षणिक समावेश और सामाजिक समानता जैसे व्यापक मुद्दों की एक झलक पेश कर रही है। अगर अब भी इस संकट को ‘कुशल प्रशासनिक चुप्पी’ की चादर में लपेटा नहीं गया, तो भविष्य में और भी कई दिये‑बुने हुए सांस्कृतिक धरोहरें इतिहास की धुंध में खो सकती हैं।

Published: May 9, 2026