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Category: समाज

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परागणकों की उपेक्षा से स्वास्थ्य और आय दोनों घटते हैं: नई अध्ययन में मिलते हैं मिलियन‑रुपये के आंकड़े

एक अंतरराष्ट्रीय शोध समूह ने हाल ही में प्रकाशित किया गया अध्ययन यह दर्शाता है कि परागणकों – मधुमक्खियों, बटरफ़्लाई, फल्लियों और अन्य— के योगदान को अब सटीक आंकड़ों में रेखांकित किया जा सका है। अध्ययन के अनुसार, विश्व स्तर पर लगभग 35 % खाद्य उत्पादों परागण पर निर्भर हैं, जो भारत में विशेष रूप से फल, सब्ज़ी और ताजे जड़ियों की पोषक‑मात्रा का प्रमुख स्रोत हैं। इस परागण में कमी केवल बागवानी को नहीं, बल्कि आहार में प्रोटीन, विटामिन A, C, और फोलिक एसिड की उपलब्धता को भी घटा रही है।

आर्थिक पक्ष पर नजर डालें तो वही शोध यह बताता है कि भारत में परागण द्वारा उत्पन्न आय सालाना लगभग 1.7 खरब रुपये के बराबर है। इस आय में छोटे‑मोटे किसानों के अतिरिक्त राजस्व, बाजार में फल‑सब्ज़ी की कीमतों में स्थिरता और निर्यात‑उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता शामिल है। जब परागणकों की संख्या में 10 % गिरावट आती है, तो अनुमानित आय में लगभग 80 अरब रुपये की कमी आती है—एक ऐसा आंकड़ा जो कई ग्रामीण विकास योजनाओं से भी बड़ा है।

भारत में परागणकों की गिरावट के प्रमुख कारणों में रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग, प्राकृतिक आवासों का विनाश, शहरीकरण की तेज़ी और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव शामिल हैं। केंद्र और राज्य सरकारें, जबकि कई बार “परागणक संरक्षण” के नाम पर अभियान चलाती हैं, लेकिन उनमें स्पष्ट नीति‑परिचालन की कमी स्पष्ट है। मौजूदा कृषि समर्थन योजनाओं—जैसे एमएसपी का निर्धारण, बीज सब्सिडी, और किसान ऋण—में परागणकों के संरक्षण को प्रमुख बिंदु के रूप में नहीं रखा गया है।

कृषि विभाग के अधिकारियों ने अक्सर बताया कि “परागणकों के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए योजना बनाना कठिन है”। यह वही बोली है जो अक्सर उन बुनियादी सुविधाओं के अभाव को भी छुपा देती है, जहाँ गायकों को आश्रय मिल सके। परिणामस्वरूप, छोटे किसानों को बीज, उर्वरक और कीटनाशक पर खर्च करने की ज़रूरत बढ़ती है, जबकि उनका प्राकृतिक सहायक धीरे‑धीरे गायब हो रहा है।

समाज के स्वास्थ्य संबंधी नुकसान भी कम नहीं है। पोषक‑सम्पन्न फल‑सब्ज़ी की उपलब्धता में गिरावट से, विशेषकर महिलाओं और बच्चों में पोषक‑अवस्थाओं की कमी बढ़ रही है। सार्वजनिक स्वास्थ्य आँकड़े बताते हैं कि पोषण‑अधूरी आहार से जुड़े रोगों में पिछले पाँच वर्षों में लगभग 12 % वृद्धि हुई है—एक ऐसी प्रवृत्ति जो सीधे परागणकों के अभाव से जुड़ी हो सकती है।

अंत में यह कहा जा सकता है कि परागणकों की उपेक्षा सिर्फ एक पर्यावरणीय चूक नहीं; यह स्वास्थ्य नीति, आय‑सुरक्षा और सामाजिक समानता के प्रयोगशाला में एक गंभीर विफलता है। यदि प्रशासन को वास्तव में ग्रामीण आर्थिक उत्थान और सार्वजनिक स्वास्थ्य को अपनाना है तो नीतियों में परागणकों को “कृषि के पाँचवाँ स्तंभ” मानकर, समान रूप से बजट आवंटन, निगरानी नेटवर्क और किसान‑शिक्षा कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना होगा। नहीं तो आज की आँकड़े कल का हिसाबी‑किताबी सिर्फ़ आँकड़ें बन कर रहेंगे।

Published: May 7, 2026