प्लेसेंटा एक्रेटा स्पेक्ट्रम: गर्भावस्था में अनजाना खतरा, महिलाओं को आपात शल्य चिकित्सा
प्लेसेंटा एक्रेटा स्पेक्ट्रम (PAS) एक दुर्लभ लेकिन अत्यधिक घातक गर्भावस्था जटिलता है, जिसे अक्सर प्रसवपूर्व जांच में अनदेखा कर दिया जाता है। कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें इस रोग की पहचान न होने के कारण आपातकालीन शल्य चिकित्सा, जिसमें अक्सर गर्भाशय निकाला जाता है, का सामना करना पड़ा।
फरवरी में शुरू किए गए जागरूकता अभियानों के बाद, सैकड़ों महिलाएँ अपनी कहानियां साझा कर रही हैं। ये कहानियां केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली की नियतात्मक चूकों का स्पष्ट संकेत हैं। रोग का पता नहीं चल पाना न केवल माँ के जीवन को खतरे में डालता है, बल्कि उसकी प्रजनन क्षमता, सामाजिक स्थिति और आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित करता है।
वर्तमान में भारत में PAS की रिपोर्टिंग अनियमित है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहले ही इस जटिलता की शीघ्र पहचान के लिए दिशानिर्देश जारी किये हैं। जबकि कुछ प्रमुख अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड एवं एमआरआई द्वारा स्क्रिनिंग की प्रक्रिया स्थापित है, अधिकांश सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक उपकरण और प्रशिक्षण की कमी बनी हुई है। इस पर सवाल उठता है कि क्या नीति निर्माणकर्ता राष्ट्रीय स्तर पर एक मानकीकृत प्रोटोकॉल लागू करने में विफल रहे हैं।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया अभी भी धुंधली है। कई राज्य स्वास्थ्य विभागों ने PAS के लिए विशेष रूप से कोई कार्य समूह या निगरानी तंत्र नहीं बनाया है। जबकि कुछ क्षणिक कार्यक्रमों की घोषणा की गई, उनका वास्तविक कार्यान्वयन दूरदराज के क्षेत्रों में नाकाबिल बना है। इस व्यवस्था की लापरवाही पर चिकित्सकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तंज़ेरी ढंग से टिप्पणी की है: “जैसे ही महिलाएँ अस्पताल में पहुँचती हैं, तो जानकारियाँ आगे‑पीछे होते‑हुए, रोग की पहचान तो एक साल के बाद ही मिलती है।”
सामाजिक प्रभाव भी उल्लेखनीय है। आपात शल्य चिकित्सा के बाद महिलाओं को अक्सर दीर्घकालिक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं से जूझना पड़ता है, जिससे उनके कार्य‑क्षमता और परिवारिक जिम्मेदारियों पर बोझ बढ़ जाता है। आर्थिक रूप से मध्यम वर्ग के लिये यह अतिरिक्त खर्च और बिमारी का भार एक गंभीर चुनौती बन जाता है।
आगे की राह स्पष्ट है: राष्ट्रीय स्तर पर PAS के लिए एक समान मानक विकसित करना, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को आवश्यक इमेजिंग उपकरण से लैस करना, तथा चिकित्सकों को नियमित प्रशिक्षण देना आवश्यक है। साथ ही, महिलाओं को इस जटिलता के लक्षणों के बारे में जागरूक करने के लिए जनसंचार अभियान जरूरी हैं। केवल तभी हम इस ‘छिपे हुए खतरे’ को मात देकर गर्भावस्था को सुरक्षित बना पाएँगे।
Published: May 6, 2026