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Category: समाज

प्रसिद्ध फैशन इवेंट का हरा कार्पेट: पर्यावरणीय चेतावनी और प्रशासनिक अंमलबजोरी

पिछले सप्ताह आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय फैशन इवेंट ने अपने प्रवेश द्वार को लाल कार्पेट से बदलकर एक घना, काई‑हरा परिदृश्य में सजा दिया। यह बदलाव राउल अबिला, बज लुहरमन और डेरिक मैकलेन के सहयोग से तैयार किया गया, जिसका उद्देश्य मेहमानों को रेनैसांस के बगीचे की कल्पना से परिचित कराना तथा फैशन व पर्यावरण के बीच के संबंध को उजागर करना था।

इसे देख कर कई सामाजिक विश्लेषकों ने कहा कि यह एक ‘सजावटी’ हरा कोना है, पर वास्तविकता में भारत में हरियाली के अभाव और पर्यावरणीय नीतियों की धुंधली स्थिति की कठोर याद दिलाता है। विश्वभर में लक्ज़री इवेंट्स में यह रुझान नई नहीं है, फिर भी ऐसा मंच जहाँ केवल चयनित अभिजाती वर्ग को ही अपने पैर रखना मिल रहा है, वह सामाजिक असमानता को और स्पष्ट करता है। आम नागरिक जो शहरी धुँध में साँस ले रहे हैं, उन्हें ऐसी शोभा‑शोभा का लाभ नहीं मिल पाता।

इवेंट के आयोजकों ने इस हरे कार्पेट को ‘पर्यावरणीय जागरूकता’ के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया, परन्तु इस घोषणा के साथ कोई ठोस नीति‑प्रस्ताव या सरकारी सहयोग नहीं दिखा। स्थानीय नगरपालिका ने इस परिवर्तन को “सूरम्य” कहकर सराहा, परन्तु शहर की कई सड़कों, अस्पतालों और विद्यालयों में अब भी कच्ची जमीन और अनपरिचित हरियाली की कमी है। ऐसी प्रशंसा और असल कार्य में अंतर दर्शाता है कि प्रशासनिक जवाबदेही किस हद तक खो गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वास्तव में पर्यावरणीय मुद्दे को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए, तो सरकार को न केवल बड़े इवेंट्स में दिखावे के लिए हरियाली लगानी चाहिए, बल्कि सार्वजनिक जागरूकता, स्कूल‑पाठ्यक्रम में पर्यावरण विज्ञान और सस्ते हरे क्षेत्रों के विकास पर वास्तविक निवेश करना चाहिए। वर्तमान में, कई नगरपालिकाओं में बजट का बड़ा हिस्सा बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और शैक्षिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत में ही जाता है, जबकि हरियाली के लिए निधि अक्सर ‘विशेष परियोजनाओं’ तक सीमित रह जाती है।

इवेंट के बाद सोशल मीडिया पर इस विषय पर कई आवाज़ें उठीं। कुछ ने इसे ‘पर्यावरणीय सबोटेज’ कहा, जहाँ बहु‑राष्ट्रीय ब्रांडों ने अपने ब्रांड इमेज को सुधारने के लिए ग्रीनवाशिंग की कोशिश की। अन्य ने कहा कि इस तरह की घटनाएँ जनता को यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हमारे शहरों में वास्तविक हरियाली क्यों नहीं है, जबकि दुनिया के कुछ हिस्सों में एक वैभवशाली ग्रीन‑कार्पेट बिछाया जा रहा है।

उपभोक्ता संगठनों ने इस अवसर पर सरकार को ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ को अनिवार्य बनाने और इसे सार्वजनिक नीति में स्पष्ट रूप से शामिल करने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर बड़े आयोजनों में हरियाली को दर्शाना इतना आसान है, तो क्यों नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में जलस्रोतों की सुरक्षा, शहरी सड़कों के किनारे प्रदूषित वायु को कम करने के लिए पेड़ लगाए जाएँ।

समय की कसौटी पर देखे तो यह हरा कार्पेट एक चमकदार छवि तो बना, पर इस चित्र के पीछे छिपी वास्तविक सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नीति‑निर्माण में दिखावे से अधिक ठोस कार्य की आवश्यकता है, ताकि न केवल अभिजात वर्ग बल्कि हर नागरिक को सच‑मुच हरिता का अनुभव हो सके।

Published: May 5, 2026