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प्रसिद्ध प्रसारक टेड टर्नर की स्मृति में भारतीय पत्रकारों ने किया चर्चा, मीडिया नीतियों की विफलता उजागर
राष्ट्रीय स्तर पर हाल ही में आयोजित एक श्रृंखला में वरिष्ठ भारतीय पत्रकारों ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी के साथ टेड टर्नर के कार्य‑क्षेत्र और सामाजिक प्रभाव पर विचार‑विमर्श किया। टर्नर को अक्सर बहु‑राष्ट्रीय समाचार नेटवर्क के जनक के रूप में स्मरण किया जाता है, पर इस सम्मान के पीछे कुछ प्रश्न भी छिपे हैं—क्या वही धारणा भारत में लागू हो रही है या हमारे सार्वजनिक प्रसारण के ढाँचे में वही साहसिकता और ज़िम्मेदारी मौजूद है?
भाषण के दौरान कई संवादकों ने कहा कि टर्नर ने अपने मंच का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य‑सूचना और आपदा‑प्रबंधन मेंประชजन को जागरूक करने के लिए किया था। भारत में ऐसी प्रयोजनीय सार्वजनिक प्रसारण अब भी एक निरर्थक वादा बनी हुई है। ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रमों, स्कूली पाठ्यक्रमों और जलवायु‑जोखिमों पर विश्वसनीय जानकारी तक पहुँच की असमानता, अक्सर स्थानीय प्रशासन की उदासीनता और मीडिया‑नियमन की अनदेखी से अधिक बढ़ जाती है।
कई पत्रकारों ने इस बात पर भी जलन व्यक्त की कि टर्नर की धनी‑धनी सहयोगी संस्थाओं के बजाए, हमारे यहाँ बड़े‑बड़े निजी समूह अपने व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक हित पर प्राथमिकता देते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर लागू नीति‑फ्रेमवर्क में वही स्पष्टता नहीं है, जिससे सूचना‑प्रसार में जबरदस्त असमानता पैदा होती है—शहर के कॉन्क्रीट‑जंगल में रहने वाले बच्चा या गरीब कस्बे के किसान दोनों को एक ही मंच से समान जानकारी नहीं मिलती।
यह अभाव न केवल लोकतंत्र की बुनियादी संवेदना को क्षति पहुंचाता है, बल्कि स्वास्थ्य‑साक्षरता दर को भी रोकता है। कोविड‑19 और अब जलवायु‑आपदाओं के दौर में जब जनता को सटीक और समयबद्ध जानकारी की सबसे अधिक आवश्यकता थी, तो मिली केवल व्यावसायिक चैनलों की आवाज़—जो अक्सर विज्ञापन‑दृष्टि से प्रेरित रहती है।
जैसे टर्नर ने अपने मीडिया साम्राज्य के माध्यम से शैक्षिक चैनल, डॉक्यूमेंट्री और सार्वजनिक‑सेवा कार्यक्रम स्थापित किए, वैसे ही भारत में सार्वजनिक प्रसारण संस्थानों को सशक्त करने के लिए स्पष्ट नीतियों का अभाव प्रशासनिक आलस्य को दर्शाता है। विनिर्माण‑केंद्रित आर्थिक नीतियों के साथ-साथ सूचना‑क्षेत्र में समान स्तर की प्रतिबद्धता न दिखाने की यह विफलता, अंततः सामाजिक असमानता को गहरा करती है।
संक्षेप में, टेड टर्नर की विरासत पर चर्चा करते हुए भारतीय मीडिया ने एक दोहरी सच्चाई प्रस्तुत की: एक ओर वैश्विक मंच पर अत्याधुनिक सार्वजनिक‑सेवा मॉडल की प्रशंसा, और दूसरी ओर हमारे देश में नीति‑निर्माताओं की अक्षम्य चुप्पी। यह मौन, प्रयोगात्मक उद्यमियों के बजाय, एक ऐसी प्रणाली को जन्म देता है जहाँ सूचना का अधिकार अक्सर केवल कुछ ही भाग्यशाली वर्गों को ही मिलता है। इस स्थिति में, जनता का भरोसा बहाल करना और प्रशासनिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना, केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस नियामक कदमों में ही संभव है।
Published: May 7, 2026