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Category: समाज

प्रसूति-ओसीडी का अज्ञान: माँओं की पीड़ा और स्वास्थ्य नीति की चूक

प्रसूति‑ओसीडी (ऑब्सेसिव‑कॉम्पल्सिव डिसऑर्डर) वह मानसिक अवस्था है जिसमें नवजात शिशु वाली माताओं को अनैच्छिक, हिंसक या अपमानजनक विचारों से घेरा जाता है। ये विचार अक्सर अत्यंत स्पष्ट होते हैं—जैसे शिशु को अनजाने में या जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की छवि—और घंटों तक दोहराते हैं, जिससे माताएँ अपने आप को ‘सबसे बुरी माँ’ समझने लगती हैं।

जब इन विचारों की तीव्रता स्वयं को जीवन समाप्त करने की आशा तक ले जाती है, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर चेतावनी संकेत बन जाता है। दो दशकों से इस क्षेत्र में सक्रिय शोधकर्ता और कार्यकर्ता यह दावा करते हैं कि मौजूदा स्वास्थ्य तंत्र इस समस्या को पहचानने, ठीक‑ठीक निदान करने और समय पर उपचार उपलब्ध कराने में लगातार विफल रहा है।

मुख्य चूक – छः‑सप्ताह के प्रसूति जाँच में मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग। राष्ट्रीय स्वास्थ्य गाइडलाइन में इस उम्र के बाद की जाँच को ‘जैविक’ मानते हुए अक्सर मानसिक स्कोरिंग को उपेक्षित किया जाता है। परिणामस्वरूप कई माताएँ, जो इस बिंदु पर सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं, बिना किसी संकेत के ही स्वास्थ्य प्रणाली से बाहर हो जाती हैं।

इसके अतिरिक्त, मौजूदा प्रणाली में अक्सर ‘पॉस्ट‑पार्टम डिप्रेशन’ की श्रेणी में इस रोग को ढँक दिया जाता है। ओसीडी‑विशिष्ट कम्पल्शन और इंट्रूज़न को अनदेखा कर, उपचार‑परिचर्चा केवल एंटी‑डिप्रेसेंट तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तव में एक्सपोज़र‑एंड‑रिस्पॉन्स एन्कोबिक थेरपी (ERP) जैसी विशेषीकृत सत्र की सिफारिश की जा रही है।

भ्रामक सुरक्षा उपाय भी समस्या को और गहरा करते हैं। कई मामलों में, माँ के विचारों को ‘बाल सुरक्षा के खतरे’ के रूप में वर्गीकृत कर, अनावश्यक बच्चा सुरक्षा प्रक्रियाएँ शुरू कर दी जाती हैं। यह न केवल माँ की सामाजिक स्थिति को कलंकित करता है, बल्कि उपचार‑केन्द्रित सहायता को भी बाधित करता है।

संकट का समाधान सरल है—पुत्री पुनर्योजन के पहले छह महीनों में हर मातृ‑जाँच में मानकीकृत ओसीडी‑स्क्रीनिंग जोड़ना, स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, और जब आवश्यकता हो तो शीघ्र ‘प्रसूति‑ओसीडी क्लिनिक’ का विकल्प देना। सार्वजनिक खर्च के आँकड़े दिखाते हैं कि उचित समय पर उपचार से जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार और अनावश्यक बाल‑सुरक्षा हस्तक्षेपों की संख्या घटती है।

व्यवस्था की यह निरंतर लापरवाही, जो ‘हर माँ को समस्या मानती है, पर समाधान की माँ को नहीं देती’, राष्ट्र की स्वास्थ्य‑सक्षमायुक्त प्रतिबद्धता पर धुंधला छाया घुमा देती है। यदि नीतिनिर्माताओं और प्रशासनिक जिम्मेदारों ने इस चुप्पी को तोड़ कर, मौलिक स्क्रीनिंग और सही‑समय एस्केलेशन को अनिवार्य नहीं किया, तो अगली पीढ़ी के माताओं को वही दर्द, वही अधूरा समर्थन और वही सामाजिक छुटकारा का सामना करना पड़ेगा।

Published: May 5, 2026