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Category: समाज

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पुरुष बाँझी पर डॉक्टरों की पुरानी सोच: अधिकारों की लड़ाई

दस वर्ष पूर्व, उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे में 30‑वर्षीय कपल ने स्थायी गर्भनिरोध के साधन के रूप में पुरुष बाँझी (वेसेक्टॉमी) की इच्छा जताई। हालाँकि दोनों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे आगे कोई बच्चा नहीं चाहते, लेकिन स्थानीय सरकारी अस्पताल के चिकित्सक ने उनकी याचिका को अस्वीकार कर दिया। डॉक्टर ने दलील पेश की कि भविष्य में पुरुष अपने संबंध बदल सकता है और फिर से संतान चाहता हो सकता है। इस तरह के व्याख्यान ने न केवल दंपति, बल्कि कई समान परिस्थितियों में फँसे परिवारों को अनावश्यक निराशा में डाल दिया।

ऐसी बातों का सामाजिक संदर्भ स्पष्ट है: भारत में आधे से अधिक गर्भनिरोधक उपाय महिलाएँ अपनाती हैं, जबकि पुरुषों के लिये वेसेक्टॉमी की जागरूकता और उपलब्धता सीमित है। कई बार यह पहलू केवल सामाजिक मान्यताओं में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की नीति‑निर्देशन में भी गहराई से जड़ जमाए हुए है। “पती की योजना” जैसी अवधारणा अभी भी बहुत कम उपयोग में है, और इस पर चिकित्सकों की संकोच दर्शाती है कि स्वास्थ्य प्रशासन ने पुरुष बाँझी को एक ‘वैकल्पिक’ विकल्प के रूप में न मान कर, इसे फेफड़ों के पास रख दिया है।

प्रभावित वर्ग मुख्यतः मध्यम‑वर्गीय और ग्रामीण-शहरी मिश्रित परिवार हैं, जो खर्चीले गर्भनिरोधक साधनों एवं निरंतर पिल सेवन से बचना चाहते हैं। उनके लिए डॉक्टर की व्यक्तिगत मान्यताएँ एक प्रकार की प्रशासनिक बाधा बनकर उभरती हैं, जिसके कारण उन्हें दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जो अक्सर स्वास्थ्य जोखिम और आर्थिक बोझ दोनों बनता है।

जब इस मामले की ओर राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति विभाग ने रुख किया, तो उन्होंने कहा कि यह एक वैयक्तिक डॉक्टर‑स्तर का निर्णय है और “भविष्य में संभावित पुनः गर्भधारण की आशंका” को ध्यान में रखकर ऐसी नीतियों को लागू किया गया है। इस औपचारिक प्रतिक्रिया ने नागरिकों को यह संदेश दिया कि नीति‑निर्माताओं को निजी राय का सार्वजनिक नियम बनाते देखना अब तक स्वीकृत हो गया है। यह उत्तरदायीता की कमी से कहीं ज्यादा एक व्यवस्थित आलस्य की कहानी है, जहाँ प्रशासन खुद को “संवेदनशील मामले” कहकर निराकरण से बचता है।

सार्वजनिक महत्व इस बात में निहित है कि पुरुष बाँझी को सामाजिक स्वीकृति दिलाने से न सिर्फ गर्भनिरोध के भार को समान रूप से बाँटा जा सकेगा, बल्कि महिला स्वास्थ्य पर अनावश्यक दबाव भी घटेगा। इसके अतिरिक्त, नीति‑निर्माण में यदि डॉक्टरों के व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को बेमेल मानकर अनदेखा किया जाता रहा, तो भारत की जनसंख्या नियंत्रण योजना पूरी तरह से विफल हो सकती है।

व्यापक परिणाम स्पष्ट हैं: यदि ऐसे ही “डॉक्टर‑निरपेक्ष” निर्णयों को अनदेखा किया गया, तो न केवल लैंगिक समता के सिद्धांत पर धूसरता आएगी, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च में भी वृद्धि होगी। इस परिप्रेक्ष्य में, निरंतर सुनवाई, व्यावसायिक प्रशिक्षण और स्पष्ट प्रशासनिक दिशा‑निर्देश आवश्यक हैं—ताकि डॉक्टर को अपनी “भविष्य की सम्भावनाओं” की भविष्यवाणी करने के बजाय रोगी के अधिकारों के अनुसार निर्णय लेना पड़े।

अंततः, यह मामला एक साधारण व्यक्तिगत असहमति नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में निहित संरचनात्मक बाधाओं का प्रतिबिंब है। जो जनता को अपने जीवन की योजना बनाने में बाधित करती है, वह केवल चिकित्सक की ‘विचारधारा’ नहीं, बल्कि उस विचारधारा को साहारा देने वाले नीति‑परिवर्तन की उदासीनता है। यही वह समस्या है जिसे ठीक करने के बिना, भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्य केवल कागज़ी वादे ही रहेंगे।

Published: May 7, 2026