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पुरानी चश्मे की अनदेखी: घरों में कचरा बढ़ता, नीति‑निर्माताओं की चुप्पी
शहरों‑ग्रामों के अधिकांश घरों में कम से कम एक जोड़ी पुरानी चश्मे पड़ी होती है—या तो प्रिस्क्रिप्शन बदल गया हो, या फ्रेम पुराना लग रहा हो, या उपयोगकर्ता ने बस नज़रें बदल दी हों। ये छोटी‑छोटी काँच और प्लास्टिक की टुकड़ियां अक्सर दराज की तल में जमा हो जाती हैं, जहाँ उन्हें न तो पुनः उपयोग किया जाता है और न ही उचित निकासी प्रणाली से गुजराया जाता है।
पर्यावरणीय दृष्टि से यह अचेतनता अनिश्चित रूप से बढ़ते घरेलू कचरे में जोड़ बनाती है। चश्मे के फ्रेम, जो मुख्यतः पॉलिकार्बोनेट और एसेटेट जैसे कठिन‑पानी‑प्रतिरोधी प्लास्टिक से निर्मित होते हैं, निकासी के बाद कई सौ साल तक नष्ट नहीं होते। सरकारी स्तर पर कोई विशिष्ट रीसाइक्लिंग योजना नहीं होने के कारण, इन वस्तुओं को कुशल पुन: उपयोग की राह नहीं मिल पाती।
नागरिक स्वयं‑इच्छा से इन चश्मों को काटकर, रंगकर या गोंद करके दीवार सजावट में बदलने के प्रयोग कर रहे हैं। यह रचनात्मक उपक्रम न केवल व्यक्तिगत संतुष्टि देता है, बल्कि कचरे को कम करने का एक व्यावहारिक संकेत भी है। परन्तु ऐसे प्रयासों पर भी प्रशासन की तटस्थ नज़र रहे‑रही है। जहाँ नीतियों में बड़े‑पैमाने पर प्लास्टिक‑वेस्ट को संभालने की दिशा‑निर्देश हैं, वहीं छोटे‑स्तरीय वस्तुओं—जैसे चश्मे—के लिए कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं है।
लोकल निकायों द्वारा प्रदत्त कचरा प्रबंधन सुविधाएँ अक्सर बेकाबू होते हैं: संग्रह‑केंद्रों में उपभोक्ता वस्तुओं के वर्गीकरण के लिए अलग बिन नहीं होते, और एकत्रित कचरे को बस लैंडफ़िल में भेज दिया जाता है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि जब तक सरकार ने चश्मे के फ्रेम को भी लैंडफ़िल‑ट्रैकिंग में नहीं डाला, तब तक ये छोटे‑छोटे “खिड़की” घरों को सजाने में नहीं आ पाएँगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा निपटान नीति में दो प्रमुख गैप हैं—पहला, रीसाइक्लिंग के लिए तकनीकी सुविधाओं की कमी; दूसरा, सार्वजनिक जागरूकता का अभाव। इसके समाधान के तौर पर सुझाव दिया गया है कि नगर निगमें “छोटे प्लास्टिक वस्तु रीसाइक्लिंग” इकाइयाँ स्थापित करें, तथा स्थानीय स्कूल‑कॉलेज के साथ मिलकर DIY (डू‑इट‑योरसेल्फ) कार्यशालाएं आयोजित कर नागरिकों को रचनात्मक पुन: उपयोग की दिशा में प्रेरित करें।
समसमय में, सामाजिक असमानता भी इस समस्या में परिलक्षित होती है। शहर के उपवास वाले क्षेत्रों में कचरा संग्रहण की कमी के कारण पुराने चश्मे को फेंक कर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि मध्यम वर्गीय घरों में इन्हें सजावट में बदलने के लिए समय और स्थान दोनों उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार न केवल पर्यावरणीय बोझ बढ़ता है, बल्कि सामाजिक विभाजन भी गहरा होता है।
इस स्थिति में प्रशासन की भूमिका केवल बुनियादी कचरा संग्रह तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि नीतिगत स्तर पर छोटे‑स्तरीय रीसाइक्लिंग को व्यवस्थित करने के लिए स्पष्ट मानक तैयार करने की आवश्यकता है। अन्यथा, घरों में पड़ी “पुरानी चश्मे” जैसी वस्तुएँ न तो त्रुटि को सुधार पाएँगी और न ही देश के सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में कोई प्रभावी कदम उठाया जा सकेगा।
Published: May 7, 2026