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Category: समाज

पानी की कमी से संघर्ष: ग्रामीण प्रदेश में सरकारी जल योजना का ढहता वादा

मध्य प्रदेश के एक पहाड़ी जिले में 2023 में शुरू की गई जल आपूर्ति योजना, अब तक केवल बारह गांवों को ही टपकती नलियों के माध्यम से पानी मुहैया करा पाई है। शेष पचास लक्षित गांवों में रोज़ाना महिलाएं तीन घंटे से अधिक समय तय करके निकटतम कुएँ या नदियों से पानी लाती हैं, जिससे उनके काम‑काज, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस खिंचाव के बाद जलजनित रोगों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है; वार्षिक रिपोर्ट में रोग संबंधी शिकायतों में 27 % की बढ़त दर्ज की गई है। महिलाओं के समय की बर्बादी और बच्चों के स्कूल से अनुपस्थित होने की दर दोनों ही नीति‑निर्माताओं के आश्वासनों के विपरीत दिखती है।

स्थानीय प्रशासन ने कारण के रूप में कठिन भूगोल, बजट आवंटन में देरी और अनुबंधित ठेकेदारों की कमीकें का हवाला दिया है। "समुचित बुनियादी ढांचा तैयार करने में तकनीकी जटिलताएँ हैं," एक अधिकारी ने कहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि योजना की गति कहीं तेज़ नहीं, बल्कि धीरे‑धीरे ठहराव की ओर बढ़ रही है।

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक लापरवाही को दिखाते‑बिलाते बडकावर शब्दों से सजा नहीं, बल्कि ठोस जवाबदेहियों की कमी ही मुख्य कारण है। उन्होंने कहा, "प्रकाशित योजना दस्तावेज़ में हर गांव को दो साल में जल आपूर्ति देना तय था, परंतु अभी तक हमें नल से नहाने का मज़ा नहीं मिला," जिससे ग्रामीण जनता के विश्वास में दरार स्पष्ट रूप से नज़र आती है।

नीति‑कार्यान्वयन में असंगति को दूर करने के लिए विशेषज्ञों ने त्वरित निरीक्षण, ठेकेदारों की जवाबदेही और समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देने की सलाह दी है। यदि इन बिंदुओं पर फोकस नहीं किया गया, तो जल संकट का भविष्य में और भी गंभीर स्वरूप होना तय है, और सरकार की वादापत्रीता को सिर्फ़ शब्दों की भरमार ही रह जाएगी।

Published: May 4, 2026