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Category: समाज

पंखों वाले चूहे के ख़र्चे‑बेमेल: कबूतर नियंत्रण नीतियों पर सवाल

भारत के बड़े मेट्रो शहरों में कबूतरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अनुमानित रूप से दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में मिलकर पाँच मिलियन से अधिक उड़ते "रैट्स विद विंग्स" पाई जा रहे हैं। इन पक्षियों की बूंदों से बेमेल शहरी सफाई, जल निकासी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, फिर भी नगरपालिका प्राधिकरण अक्सर महंगे और बर्दाश्त‑नियंत्रण वाले उपायों पर भरोसा करते हैं।

पटना नगर निगम ने पिछले साल १.५ करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी थी, जिसमें हाई‑ऊर्जा लेज़र, ध्वनि बम और सैकड़ों हंस‑प्रत्येक वाइल्ड‑लाइफ विशेषज्ञों को बुलाकर कबूतरों को भगाने की योजना थी। इसी तरह, कोलकाता के कुछ क्षेत्रों में नियोजित "हॉक्स की टीम" ने दो हॉक‑जड़ों को निःश्बन्धित बाड़ पर रखवाड़ के लिये तैनात किया, जिससे कुछ हफ़्तों में दो सौ से अधिक कबूतर की मौत हुई – खर्च ५ लाख रुपये, लेकिन कबूतरों की कुल आबादी पर कोई स्थायी असर नहीं।

इन अप्रमाणित उपायों के साथ ही, स्थानीय मीडिया में अक्सर यह चर्चा नहीं होती कि कबूतर नियंत्रण के लिए कई कम‑खर्चे, मानवीय विकल्प उपलब्ध हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिद्ध बायो‑डायवर्स़न तकनीक – निकार्बाज़िन‑आधारित फीड, जो पक्षियों की प्रजनन क्षमता को सीमित करता है – को अपनाने में भारतीय नगर परिषदें झिझकती दिखती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस विधि के लिये शुरुआती निवेश कम है, लेकिन प्रभाव दीर्घकालिक और स्थिर होता है, जो राजनीतिक बचाव‑सत्रों की अपेक्षा नहीं करता।

शहरी असमानता इस समस्या को और गहरा करती है। गरीब वसंतियों के निकट स्थित नालियों में कबूतरों की गंदगी से जलजनित रोग उत्पन्न होते हैं, जबकि शानदार हाई‑रिज़िडेंस में वही समस्या कम दिखाई देती है। फिर भी बजट में कबूतर नियंत्रण के लिये विशेष फाइलें तैयार करने की प्रक्रिया अक्सर उच्च वर्ग की जिलों में ही चलती है, जबकि वास्तविक तकलीफ़ उस वर्ग को नहीं झेली जाती।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया में अक्सर “आकस्मिक योजना” शब्द सुनाई देता है, पर उसका वास्तविक कार्यान्वयन मंदी की रफ्तार से चल रहा है। कई नगर निकायों ने अपने वार्षिक बजट में कबूतर नियंत्रण के लिये अतिरिक्त १० करोड़ रुपये आवंटित किए, पर अधिकारी अक्सर इसे "रूटीन सफाई" या "पैट्रोलिंग" के रूप में वर्गीकृत कर देते हैं, जिससे जवाबदेही का कोई ठोस बिंदु नहीं बन पाता।

वास्तव में, कबूतर नियंत्रण के लिये एक समग्र नीति – जिसमें वैज्ञानिक‑आधारित प्रजनन नियंत्रण, किरायेदार‑सुरक्षित पेन टैम्पर, और सतत सार्वजनिक जागरण शामिल हो – अधिक प्रभावी और आर्थिक रूप से व्यर्थ नहीं होगा। प्रशासन को अब न सिर्फ खर्च‑बेमेल उपायों को रोकना चाहिए, बल्कि ऐसी योजना बनानी चाहिए जो नागरिकों के स्वास्थ्य, पर्यावरणीय संतुलन और राज्य की जिम्मेदारी को प्राथमिकता दे।

Published: May 4, 2026