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Category: समाज

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नदी मोंटर गिरगिट के आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश से उत्पन्न मानव‑वाइल्डलाइफ़ टकराव

पिछले कुछ महीनों में कई शहरों के बड्ढे, तालाब और कचरे के ढेरों के पास दिखने वाले बड़े रेंगते प्राणी, अब एक बार फिर गृह परिसर में दिखाई दे रहे हैं। ये 2‑3 मीटर तक लम्बे, तेज दाँतों वाले नदी मोंटर गिरगिट (Nile monitor) हैं, जो मूलतः अफ्रीका के नदी तटों में पाये जाते हैं, परंतु शहरी प्रदूषण, कचरा प्रबंधन की दरिद्रता और अनियंत्रित पालतू प्रजनन से यहाँ तक पहुँचे हैं।

घरों में इनका प्रवेश मुख्यतः तीन मूल कारणों से होता है – भोजन की तलाश, जल स्रोत की खोज और उपयुक्त आश्रय की आवश्यकता। शहरों के खुले नालों में फंसे मलबे में जाकर कीड़े‑मकोड़े, छोटे स्नेहजीव और कभी‑कभी पालतू पशुओं की अवशेषों पर इन्हें आसानी से ढूँढ मिल जाता है। साथ ही, जल निकायों के निकट रहने वाले घरों में तालाब या अटारी के जलस्तर को लेकर इन्हें आकर्षित किया जाता है। अंत में, कुचलती हुई इमारतों, अनजाने में छोड़े गए बांस, लकड़ी और कंक्रीट के ढेरों में इन्हें अपने छिपने के लिए उपयुक्त स्थान मिल जाता है।

इनका आकार और अचानक सामने आने की प्रवृत्ति स्थानीय लोगों में भय उत्पन्न करती है। वैज्ञानिक मत के अनुसार, ये सरीसृप आम तौर पर मनुष्यों से दूर रहते हैं और केवल तब ही हमले की प्रवृत्ति दिखाते हैं जब उन्हें कोनों में फँसाया जाता है। फिर भी, उनकी तीव्रता और नज़र मारने वाली आँखें मामूली चोटों में भी संक्रमण का कारण बन सकती हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न उभरता है।

पर्यावरणीय संकाय और नगरपालिका प्रशासन ने इस मुद्दे पर अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए हैं। कई नगर पालिकाओं में वन्यजीव नियंत्रण के लिये विशेष दल नहीं हैं, और मौजूदा “कीट‑कीट नियंत्रण” विभाग अक्सर कछुए और साप को ही देखता है, न कि रेंगते बड़े सरीसृप को। परिणामस्वरूप, घर‑घर में आविद्यायित “पेशेवर” को हटाने वाले व्यक्ति बेधड़क विषैले जहर या जाल का प्रयोग कर रहे हैं, जो न केवल गिरगिट की प्रजाति को खतरे में डालता है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी बिगाड़ता है।

सामाजिक दृष्टिकोण से, यह समस्या मुख्यतः शहरी गरीब वर्ग और उपनगरीय बस्ती के लोगों को प्रभावित कर रही है। इन क्षेत्रों में कचरे के संचयन, जल निकासी की खराब स्थिति और खुले में जल स्रोतों की उपलब्धता अधिक होती है, जिससे मानव‑वाइल्डलाइफ़ टकराव की संभावना बढ़ जाती है। वहीं, कई मध्य‑और उच्च वर्ग के बशर्ते “हाउस मैनजमेंट” कंपनियां इस समस्या को उपेक्षा के तौर पर प्रस्तुत करती हैं, जिससे सामाजिक असमानता की नई परत जुड़ती है।

वर्तमान में विशेषज्ञों ने कुछ व्यावहारिक, मानवीय उपाय सुझाए हैं:

इनमें से कुछ उपाय सरल लगते हैं, परन्तु इनके क्रियान्वयन में निहित “व्यवस्था की विफलता” स्पष्ट है। प्रशासन के पास बजट तो है, लेकिन उस बजट को सही प्रायोगिक योजना में नहीं डाला गया।

अंत में यह कहना बाकी नहीं कि ऐसे छोटे‑छोटे लेकिन संभावित खतरों को नजरअंदाज करने से न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा को जोखिम में डालता है, बल्कि शहरी पर्यावरणीय संतुलन को भी धूमिल करता है। एक नागरिक के रूप में हमें अपने अधिकार के तहत उन बुनियादी सुविधाओं की मांग करनी चाहिए, जो इस तरह के वन्य‑मानव टकराव को रोक सके, और साथ ही प्रशासन को इस बात का सबक सिखाना चाहिए कि “जैव विविधता के संरक्षण में लापरवाही” का दाम सिर्फ एक चिह्नित झिप नहीं, बल्कि जीवन‑सुरक्षा का प्रश्न है।

Published: May 8, 2026