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Category: समाज

नगर निगम की आत्म‑सम्मान कार्यशाला: निजी आदतों से सामाजिक सशक्तिकरण तक

बेंगलुरु के कुछ वार्डों में इस सप्ताह नागरिक केंद्रों में ‘आत्म‑सम्मान निर्माण’ पर कार्यशालाएँ आरम्भ की गईं। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि रोज़मर्रा की दस आदतों पर ध्यान देकर लोगों को स्वयं को प्राथमिकता देना सिखाया जाएगा, जिससे व्यक्तिगत सीमाएँ स्पष्ट होंगी और सामाजिक व्यवहार में बदलाव आयेगा।

कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता, सामाजिक मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ. रश्मि बांगर ने कहा, “जब व्यक्ति अपनी गरिमा को खुद तय करता है, तो समाज भी उसे उसी नजरिए से देखना शुरू करता है। यह केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि संवाद की नई शैली बनता है।”

इन कार्यशालाओं का लक्ष्य मुख्यतः निचली आय वर्ग, विशेषकर महिला एंट्री‑लेवल कर्मियों और शहरी स्लम क्षेत्रों के रहवासियों को स्वयं‑सम्मान के सिद्धांतों से परिचित कराना है। प्रतिभागियों को बताया गया कि ‘समय पर पहुँचना, सीमाओं को स्पष्ट करना, स्वस्थ पोषण व पोशाक विकल्प अपनाना’ जैसे सरल कदम सामाजिक मान्यता को प्रभावित कर सकते हैं।

हालांकि इस पहल को प्रशंसा मिली है, लेकिन कई नागरिकों ने मौजूदा प्रशासनिक चुनौतियों को उजागर किया। स्लम क्षेत्रों में शौचालय, पानी की निरन्तर आपूर्ति और सुरक्षित सार्वजनिक स्थानों की कमी अभी भी लोगों के दैनिक सम्मान के अधिकार को जकड़ती है। “हम आत्म‑सम्मान के बारे में सिखाए जा रहे हैं, पर हमारे बच्चे स्कूल की नालियों में कूदते हुए भी असुरक्षित महसूस नहीं कर पाते,” एक स्थानीय राहतकर्ता ने कहा।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से बताया गया है कि आत्म‑सम्मान को मानसिक स्वास्थ्य के साथ जोड़ना आवश्यक है, पर मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी और कठिन पहुँच इस कड़ी को तोड़ रही है। “आत्म‑सम्मान की आदतें तभी फलेंगी जब चिकित्सीय सहायता, शिक्षा और सार्वजनिक सुविधाएँ साथ‑साथ हों,” स्वास्थ्य अधिकारी अंजलि सिंह ने उल्लेख किया।

नीति‑निर्माताओं की तरफ से कहा गया है कि यह पहल राष्ट्रीय ‘सशक्त महिला और युवा’ योजना के तहत आती है, पर इसके कार्यान्वयन में शहरी-ग्रामीण अंतर बहुत नियाल रहे हैं। कई विशेषज्ञ इस बात पर तर्क करते हैं कि केवल व्यवहारिक सत्रों से गहरी सामाजिक असमानताओं को मिटाया नहीं जा सकता—इसे जमीनी स्तर पर बुनियादी सेवाओं की पूर्ति के साथ जोड़ना चाहिए।

व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाए तो, जबकि नगर निगम ने ‘आत्म‑सम्मान की 10 आदतें’ का प्रचार किया, वहीं कच्चे जल की बोतलों का वितरण भी एक ही मंच पर हो रहा है। यह दोहरा मानक दर्शाता है कि नीति‑निर्माण में विचार‑पर्याप्ति और कार्य‑कार्यान्वयन के बीच अभी बहुत दूरी है।

भविष्य में इस तरह के कार्यक्रमों की सफलता तभी मापी जा सकेगी जब स्वयं‑सम्मान के व्यक्तिगत अभ्यास को सार्वजनिक संसाधनों की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और शिक्षा की गुणवत्ता के साथ तालमेल में विकसित किया जाए। तभी ‘आत्म‑सम्मान’ शब्द निति‑निर्माताओं के भ्रमात्मक बैनर से हटकर हर नागरिक की वास्तविक रोज़मर्रा की ज़िंदगी में प्रतिबिंबित होगा।

Published: May 4, 2026