जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

नए किरायेदार अधिकार अधिनियम से निजी किरायेदारों को मिले कानूनी सुरक्षा की आशा

पिछले दो दशक में भारत में निजी किराये का क्षेत्र तेज़ी से बढ़ा है। राष्ट्रीय आवास सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, 2005 में कुल घरों में निजी किरायेदारों का हिस्सा 12% था, जबकि 2025 तक यह 32% तक पहुँच गया। उसी समय 25‑34 वर्ष की आयु वर्ग में गृहस्वामित्व की दर 2000 के 61% से गिरकर 2025 में केवल 22% रह गई। युवा वर्ग के लिए घर खरीदना अब सपना नहीं, बल्कि दूर का दृश्य बन गया; अधिकांश अब स्थायी किराए पर जीवन जीने का विकल्प चुने हैं।

इन परिस्थितियों में निजी मकान मालिकों के साथ खाता‑पुस्तक की असमानता स्पष्ट हो गई। कई रिपोर्टों में यह उजागर किया गया है कि किरायेदारों की मरम्मत की मांग या किराया बढ़ाने के विरोध पर ही उन्हें बिना कारण (no‑fault) निकास नोटिस जारी किया जाता है। सामाजिक संगठनों के सर्वे के हिसाब से, शिकायत करने वाले किरायेदारों को निकासी का खतरा 1.6 गुना अधिक रहा। ऐसे माहौल में किरायेदारों के लिए घर की सुरक्षा एक डर बन गई है।

इसी पृष्ठभूमि में इस महीने केंद्र सरकार ने "किरायेदार अधिकार अधिनियम" पारित किया। अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं: (i) किरायेदार द्वारा मरम्मत या किराया विवाद के संबंध में शिकायत करने पर पेशकश‑आधारित निकासी पर प्रतिबंध, (ii) किराया वृद्धि पर वार्षिक सीमा निर्धारित करना, (iii) अनिवार्य लिखित किरायेदारी अनुबंध, और (iv) किरायेदार के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले मकान मालिक पर आर्थिक दंड।

सरकारी अधिकारियों ने इस कदम को "आधुनिकी भारत में रहने योग्य वातावरण सुनिश्चित करने" की दिशा में महत्वपूर्ण मान्यता दी है। एक प्रवक्ता ने कहा, "किरायेदारों को अब ‘किराए की शांति’ का अधिकार मिलेगा, और अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए राज्य‑स्तर पर एक विशेष निगरानी आयोग स्थापित किया गया है।"

हालाँकि, इस प्रशंसनीय कदम की व्यावहारिक संभावनाएं अभी भी सवालों के घेरे में हैं। किरायेदारी के रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से जोड़ने के लिए कई राज्य अभी भी अधूरे सिस्टम संचालित कर रहे हैं; भूमि‑रजिस्ट्री डेटा की खामियों के कारण किरायेदारों की शिकायतों का ठोस पता लगाना कठिन होगा। इसके अलावा, दंड प्रक्रिया में अक्सर लंबी अदालतियों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जिससे तत्काल राहत मिलना मुश्किल हो सकता है।

नागरिक संगठनों ने अधिनियम की सराहना करते हुए कहा कि यह नीति‑निर्माण में पहली बार किरायेदारों को “कानूनी रक्षा” का स्पष्ट रूप दिया गया है। फिर भी वे इस बात पर बल दे रहे हैं कि अधिनियम को प्रभावी बनाना केवल कागज़ पर कानून लिखने से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर तैनात अधिकारियों की तत्परता, सुलभ कानूनी सहायता और जागरूकता अभियानों पर निर्भर करता है।

विस्तृत सामाजिक प्रभाव के लिहाज़ से यह अधिनियम एक दोधारी तलवार है। एक ओर यह अनिश्चितता में रहने वाले लाखों किरायेदारों को कुछ कानूनी भरोसा दे सकता है, तो दूसरी ओर अगर प्रशासनिक अड़चनें बनी रहती हैं तो यह सिर्फ कागज़ी ढाल बन कर रह सकता है। जैसा कि वरिष्ठ नीति विश्लेषक ने तंज़ के साथ कहा, "अब सरकार ने किरायेदारों को अधिकार दिया है, अब देखना है कि ये अधिकार कब तक बिन‑कार्यकारी फाइलों में समान रहेंगे।"

Published: May 6, 2026