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निति आयोग की चेतावनी: सरकारी स्कूलों में नामांकन घटकर 50 % से नीचे
निति आयोग के नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले बीस वर्षों में भारत के सरकारी स्कूलों में छात्र नामांकन में तीव्र गिरावट आई है। वर्तमान में यह अनुपात 50 % से भी कम हो गया है, जबकि दो दशकों पूर्व की स्थिति लगभग 75 % थी। यह प्रवृत्ति न केवल शैक्षणिक प्रणाली की संपूर्ण विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, बल्कि नगरीय‑ग्रामीण, धनी‑गरीब वर्गों के बीच बढ़ती असमानता का स्पष्ट संकेत भी देती है।
गणना के पीछे प्रमुख कारण माता‑पिता की प्राथमिकता में बदलाव है। अधिकतर परिवार अंग्रेजी‑माध्यमीय शिक्षा और रोजगार‑उन्मुख पाठ्यक्रम को बेहतर भविष्य का गेटवे मानते हैं, इसलिए वह निजी विद्यालयों की ओर रुख कर रहे हैं। निजी संस्थानों में प्रवेश शुल्क कम होने के साथ‑साथ, कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ, योग्य शिक्षक और पाठ्यक्रम की गुणवत्ता में कमी स्पष्ट है। परिणामस्वरूप, निचली आय वर्ग के छात्रों को दोहरी कठिनाई का सामना करना पड़ता है: सरकारी स्कूलों का धूमिल होना और निजी स्कूलों का घटिया स्तर।
शिक्षा‑विनिमय का यह असंतुलन सामाजिक संरचना में गहरी दरारें उत्पन्न कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों पर भरोसा अभी भी जीवित है, परन्तु शहरी और उपनगरीय इलाकों में निजी संस्थाओं की अंधाधुंध लोकप्रियता ने सार्वजनिक शिक्षा को असहाय बना दिया है। इससे न केवल शैक्षिक उपलब्धियों में अंतर बढ़ रहा है, बल्कि सामाजिक गतिशीलता की संभावना भी सीमित हो रही है।
प्रशासनिक स्तर पर प्रतिक्रिया अभी तक ठोस नहीं दिखी है। कई राज्य शिक्षा विभागों ने स्कूलों में बुनियादी आधारभूत सुविधाओं के सुधार की घोषणा की है, परन्तु बजट आवंटन, निगरानी तंत्र और मानक‑आधारित शिक्षक प्रशिक्षण में गंभीर कमी बरकरार है। नीति‑निर्माताओं की ओर से ‘डिजिटल कक्षाएँ’ और ‘स्मार्ट स्कूल’ जैसी पहलों का उल्लेख अक्सर सुनने को मिलता है, परन्तु ground‑level पर उनका कोई ठोस प्रभाव नहीं दिख रहा।
विश्लेषकों का मानना है कि केवल ‘अधिकार‑पर‑जागरूकता’ अभियान चलाने से स्थिति बदली नहीं जा सकती। एकीकृत निष्पादन ढांचा, सार्वजनिक‑निजी साझेदारी में गुणवत्ता‑उन्मुख शर्तें और पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली आवश्यक हैं। सरकारी स्कूलों को फिर से आकर्षक बनाने के लिए न केवल बुनियादी बुनियादी ढाँचा बल्कि शिक्षण‑प्रणाली, पाठ्यक्रम की भाषा‑नीति और करियर‑उन्मुख कौशल प्रशिक्षण को भी पुनः परिभाषित करना होगा।
निति आयोग द्वारा प्रस्तुत डेटा इस बात की याद दिलाता है कि शिक्षा को सामाजिक बराबरी का प्रमुख आधार माना जाता है, फिर भी नीति‑निर्माण में समय‑सापेक्षता और प्रभाव‑केन्द्रित दृष्टिकोण की कमी स्पष्ट दिखती है। यदि इस झंझट को ठीक करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में भारत के मानव पूँजी विकास पर एक ठहराव युक्त छाप कायम हो सकती है।
Published: May 7, 2026