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Category: समाज

धूम्रपान छोड़ने पर फेफड़ों की मरम्मत: विज्ञान और नीति‑संकट

इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के शोध समूह के प्रमुख डॉ. शार्लॉट डीन के अनुसार, फेफड़े पहले ‘अमरम्मत’ माना जाता था, पर अब वैज्ञानिक प्रमाण दर्शाते हैं कि धूम्रपान छोड़ने के बाद वे अपनी क्षति को काफी हद तक ठीक कर सकते हैं। यह बायोलॉजिकल क्षमता फेफड़ों को प्राकृतिक रूप से प्रदूषण, संक्रमण और टार की हानियों से निपटने में मदद करती है।

भारत में औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में धूम्रपान की प्रचलनात्मक दर अभी भी उच्च है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2023‑24 के अनुसार, लगभग 28 % पुरुषों और 5 % महिलाओं की उम्र‑रोज़ाना धूम्रपान की आदत है, जिसमें अधिकांश ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में यह अधिक देखने को मिलता है। इन समूहों को अक्सर स्वास्थ्य‑सेवा तक सीमित पहुँच, सस्ती निकोटिन रिप्लेसेमेंट थेरेपी की कमी और जागरूकता अभियान की अनुपस्थिति का सामना करना पड़ता है।

जो वैज्ञानिक आशा वाकई में मौजूद है, वह सामाजिक‑नीति के चक्रव्यूह में फँस गयी है। 2003 के ‘सिगरेट एक्ट’ के बाद से भारत ने धूम्रपान पर कई प्रतिबंध लगाए, परंतु धूम्रपान cessation के लिये सुस्पष्ट और सुलभ उपचार संयंत्रों की कमी अभी भी सरकारी नीति की अंधी कमियों को उजागर करती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन‑2 में उल्लेखित ‘टॉबैको नियंत्रण कार्यक्रम’ अक्सर बजट कटौती और कार्यान्वयन में देरी के कारण सिर्फ कागज़ पर ही रहता है।

व्यवस्थापकीय लापरवाही का एक और पहलू है सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों की ‘एक आकार सभी के लिये’ रणनीति। जबकि शहरी क्षेत्रों में विज्ञापन प्रतिबंध और पैकेजिंग चेतावनी प्रभावी रहे हैं, ग्रामीण इलाकों में वही संदेश अक्सर अनदेखी रह जाता है, क्योंकि लाक्षणिक भाषा, स्थानीय ड्रामा या मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों का अभाव है। परिणामस्वरूप, फेफड़ों की प्राकृतिक मरम्मत क्षमता को लाभान्वित करने हेतु धूम्रपान बंद करने का अवसर कई नागरिकों के लिये केवल कल्पना बना रहता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है। धूम्रपान‑संबंधित रोगों से होने वाली औसत वार्षिक राष्ट्रीय आय की हानि अनुमानित 1 % से अधिक है, जबकि फेफड़े की मरम्मत क्षमता को कम करके आँकना स्वास्थ्य‑सेवा प्रणाली पर भार बढ़ाता है। यदि सरकार सक्रीय रूप से निकोटिन रिप्लेसेमेंट थैरेपी, परामर्श केंद्र और मोबाइल क्लीनिकों को बढ़ावा देती, तो न केवल रोगी‑जीवन में सुधार होता, बल्कि स्वास्थ्य खर्च में भी कटौती संभव होती।

इन सबके बीच, नीति‑निर्माताओं का अक्सर ‘खर्च‑बचत’ मोर्चा ही प्रमुख रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि फेफड़ों को ‘खुद मरम्मत करने की कला’ दे दी गई है, पर सरकार को वही जादू दिखाने में साल लगाते हैं। यही वही ‘सुरक्षा जाल’ है, जहाँ वैज्ञानिक प्रगति और सामाजिक भलाई के बीच दूरी केवल कागज़ी नीति के शब्दों से तय की जाती है।

समाज के लिए संदेश स्पष्ट है: धूम्रपान छोड़ने पर फेफड़े ठीक हो सकते हैं, पर इसे समाज के हर वर्ग तक पहुँचाने के लिये सिर्फ विज्ञान नहीं, बल्कि गंभीर नीति‑कार्यान्वयन, सस्ती उपचार सुविधाएँ और सतत जागरूकता कार्यक्रम की आवश्यकता है। अन्यथा, फेफड़ों की यह अद्भुत पुनर्स्थापन क्षमता भी केवल एक वैज्ञानिक तथ्य ही रह जाएगी, जबकि असंख्य भारतीय जीवन इस लाभ से वंचित रहेंगे।

Published: May 4, 2026