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Category: समाज

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दक्षिण अफ्रीका में दो यात्रियों में एंडीज़ हांटा वायरस की पुष्टि, भारत की स्वास्थ्य सुरक्षा पर बड़ा सवाल

विदेशी यात्रा के सुअवसर के साथ स्वास्थ्य जोखिम भी बढ़ते हैं, ऐसा एक बार फिर स्पष्ट हो गया है। दक्षिण अफ्रीका में दो यात्रियों में एंडीज़ स्ट्रेन हांटा वायरस की पुष्टि हुई है, जिसका उल्लेख देश के स्वास्थ्य मंत्री ने किया। यह घटना न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य निगरानी की कमियों को उजागर करती है, बल्कि भारत के स्वयं के प्रवासी स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है।

एंडीज़ स्ट्रेन हांटा वायरस मूलतः दक्षिण अमेरिकी जंगली चमगादड़ों से मनुष्यों में संक्रमण करता है और गंभीर श्वसन समस्याएँ व हेमोफेज़ी उत्पन्न कर सकता है। इसकी संक्रमण दर और मृत्यु दर दोनों कई अन्य स्ट्रेनों की तुलना में अधिक है, इसलिए इसे ‘उच्च जोखिम’ की श्रेणी में रखा गया है। दो व्यक्तियों में इस वायरस की पुष्टि होने के बाद, स्वास्थ्य मंत्रालय ने तत्काल संपर्क tracing और परीक्षण का आयोजन किया, परंतु इस प्रक्रिया की गति और पारदर्शिता पर अभी तक व्यापक जानकारी नहीं मिली।

जहाँ विदेश में ऐसी स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया की उम्मीद की जाती है, वहीं भारत में समान मामलों के लिये हमारे अभियांत्रिकी सर्वेक्षण, एयरपोर्ट स्वास्थ्य सेवाएं और पोर्टेबल क्वारंटाइन सुविधाएं अक्सर ‘पर्याप्त नहीं’ की लकीर पर खड़ी रहती हैं। विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के यात्रियों को स्वास्थ्य जाँच के दौरान उचित सुविधाएँ नहीं मिल पातीं—जैसे कि यात्रा बीमा, प्राथमिक स्वास्थ्य बुसता, या समय पर परीक्षण। यह सामाजिक असमानता न केवल रोग के प्रसार को बढ़ावा देती है, बल्कि नीतियों के कार्यान्वयन में भी झलकती है।

इस घटना के बाद भारतीय दूतावास ने ‘ध्यान में रखने योग्य’ के रूप में एक बयान जारी किया, परंतु वास्तविक कदम—जैसे कि चुनी हुई हवाई अड्डों पर अतिरिक्त स्क्रीनिंग, वायरस के लिए विशेष परीक्षण किट की उपलब्धता, या यात्रा के बाद फॉलो‑अप—के बारे में कोई ठोस घोषणा नहीं हुई। यह वही प्रशासनिक “विलंब” है, जिसकी आलोचना नागरिक संस्था और स्वतंत्र विशेषज्ञ अक्सर करते आती हैं।

स्वास्थ्य सुरक्षा में जागरूकता और शिक्षा का अभाव भी एक प्रमुख दोष है। कई यात्रियों को हांटा वायरस के बारे में मूलभूत जानकारी नहीं होती—जैसे कि कौन से क्षेत्रों में यह मौजूद है, कौन से लक्षण देखे जाएँ, और कब चिकित्सा सहायता ली जानी चाहिए। यह खामि स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा के पाठ्यक्रम में अनुपस्थितियों से जुड़ी है, जहाँ रोग विज्ञान को ‘औपचारिक’ रूप में नहीं पढ़ाया जाता।

अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत अपने नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य खतरों से बचाने के लिए पर्याप्त संसाधन आवंटित कर रहा है, या केवल “एक बार फिर” औपचारिक बयान द्वारा खुद को शांति प्रदान कर रहा है। इस तरह की स्थितियों में नीति‑निर्माताओं को केवल सार्वजनिक बयान नहीं, बल्कि ठोस कदम—जैसे कि सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अनिवार्य वायरस‑विशिष्ट परीक्षण, तेज़ संपर्क tracing प्रणाली, और महामारी‑संगत क्वारंटाइन हब—को अपनाने की आवश्यकता है।

यदि इस प्रकार की प्रतिक्रियात्मक उपायों पर ही भरोसा किया गया, तो भविष्य में स्वास्थ्य संकटों को ‘सिर्फ़ सूचना के रूप में’ ही नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में व्यवधान के रूप में भी देखने को मिल सकता है। समय अब है कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए, ताकि प्रत्येक नागरिक, चाहे वह आर्थिक रूप से कहीं भी हो, स्वास्थ्य सुरक्षा की समान गारंटी का हक़दार बन सके।

Published: May 7, 2026