दिवसीय झपकी: स्वास्थ्य संकट की चेतावनी
श्रमिकों, छात्रों और गृहिणियों के बीच लगातार बढ़ती हुई ‘झपकी’ की प्रवृत्ति ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों को सतर्क कर दिया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के डॉक्टर आज़ी़जा का मानना है कि अनियमित या थकान‑भरी नींद सिर्फ थकान का लक्षण नहीं, बल्कि कई अंतर्निहित बीमारियों की सतह को छू रही है।
वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में लंबी कार्य‑घंटे, शहरी आवास की भीड़भाड़, और डिजिटल स्क्रीन के लगातार संपर्क जैसी कारकें लोगों को पर्याप्त रात की नींद से वंचित कर रही हैं। परिणामस्वरूप कई लोग दिन के दौरान छोटे‑छोटे आराम के क्षणों पर निर्भर हो रहे हैं। लेकिन यह आराम कहीं न कहीं गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों की ओर इशारा कर सकता है, जैसे कि स्लीप एपनिया, हाइपरटेंशन, मधुमेह, अवसाद और यहाँ तक कि हृदय‑धमनी रोग।
डॉ. आज़ी़जा ने बताया कि जब झपकी बार‑बार आती है, तो यह अक्सर रक्त शर्करा नियंत्रण, थायराइड कार्य, या लाल रक्त कोशिकाओं की कमी जैसे रोगों के संकेतक हो सकते हैं। “यदि कोई व्यक्ति बिना कारण लगातार 30‑45 मिनट की झपकी लेता है, तो यह सिर्फ थकान नहीं, बल्कि शरीर की सूचनात्मक चेतावनी है,” उन्होंने कहा।
सरकारी स्तर पर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पिछले महीने ‘स्लीप हेल्थ गाइडलाइन’ जारी की, जिसमें कार्यस्थलों पर नींद के महत्व को रेखांकित किया गया है। तथापि, इन दिशानिर्देशों का जमाखर्ची कार्यान्वयन अभी तक स्पष्ट नहीं दिख रहा। कई कार्यालयों में ‘बैठक के दौरान झपकी‑बाज’ कर्मचारियों को समझने के बजाए ‘एयर कंडीशनर की तेज़ गति’ को कारण बताते हुए कार्रवाई नहीं की जा रही है। यह स्वाभाविक है कि जब सरकार स्वयं मीटिंग‑रूम में ‘स्लिप‑ऑफ़’ की आदत से जूझ रही है, तो जनता को निद्रा‑सम्बंधी सुरक्षा के लिए क्या उपाय मिलेंगे?
नॉन‑गवर्नमेंटल संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर जागरूकता अभियान शुरू किए हैं। ‘स्लीप वैली’ के संस्थापक ने कहा, “समुदाय स्तर पर नींद की शिक्षा को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक है, ताकि अगली पीढ़ी अपनी नींद को स्वास्थ्य का ‘इको‑सिस्टम’ समझे।” साथ ही, कई पब्लिक हेल्थ क्लिनिकों में ‘नींद की जांच’ को निःशुल्क सेवा बनाने की मांग बढ़ रही है।
व्यावहारिक पहल के रूप में, कुछ निजी कंपनियों ने ‘पावर नैप पॉड’ स्थापित कर कर्मचारियों को 15‑20 मिनट की नियंत्रित झपकी की अनुमति दी है, जिससे कार्य‑उत्पादकता में वृद्धि बताई गई है। यह कदम सार्वजनिक क्षेत्र में देर से नहीं आ सकता, क्योंकि बिन‑सहयोगी नीति‑निर्माण और अंधाधुंध बजट आवंटन के कारण अधिकांश सरकारी संस्थानों में अभी भी ‘धुंधली’ नींद के अंधेरे में ही रहना पड़ता है।
अंततः, यह स्पष्ट है कि दिवसीय झपकी को केवल ‘क्लेंट’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक गंभीर संकेतक मानना आवश्यक है। नीति‑निर्माताओं को नीतियों के कागज़ी रूप से आगे बढ़कर, कार्यस्थलों, विद्यालयों और समुदायों में व्यावहारिक, साक्ष्य-आधारित उपाय लागू करने चाहिए—ताकि एक झपकी में ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की नींद में सुधार हो सके।
Published: May 4, 2026