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दिल्ली सरकार की स्कूलों की गर्मी की छुट्टियों में पुनरावृत्ति कक्षाओं का अल्पकालिक कदम
दिल्ली सरकार ने 11 मई से 30 जून तक सभी सरकारी स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया है। इस बड़े अंतराल के बीच, मात्र 13 दिनों (11‑23 मई) के लिए नौवीं, दसवीं और बारहवीं कक्षा के छात्रों को विज्ञान‑गणित के पुनरावृत्ति सत्र प्रदान करने का निर्णय सुना गया।
यह कदम निस्संदेह उन अभिभावकों और छात्रों के लिये राहत का स्वर है जो बोर्ड परीक्षा की तैयारी में लगातार पढ़ाई से थक चुके हैं, पर साथ ही यह सवाल भी उठाता है कि क्या दो सप्ताह का तीव्र शैक्षिक हस्तक्षेप वास्तव में शैक्षिक असमानता को पाटने में पर्याप्त है। खासकर उन स्कूलों में जहाँ कक्षा‑शिक्षक अनुपस्थिति, अधूरा पाठ्यक्रम और संसाधनों की कमी रोज़मर्रा की वास्तविकता है।
सरकारी दस्तावेजों में बताया गया है कि इन सत्रों में विज्ञान और गणित के मूल सिद्धांतों को मजबूती से दोहराया जाएगा, जबकि आवश्यकता अनुसार अन्य विषयों को भी शामिल किया जा सकता है। यह लचीलापन प्रशंसनीय है, परंतु यह भी संकेत देता है कि योजना अभी भी तैयार नहीं है—किस विषय को कब, किस स्तर पर जोड़ना है, इसका स्पष्ट ढांचा नहीं दिखता।
शिक्षा नीति के विशेषज्ञों ने पहले से ही चेतावनी दी थी कि ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान छात्रों की सीखने की गति धीमी पड़ जाती है, और इसे रोकने के लिये निरंतर, व्यवस्थित कार्यक्रम आवश्यक होते हैं। दो‑सप्ताह के अचानक सिंगल‑स्ट्रेस सत्रों की अनुमति देना न तो व्यापक सुधार का जश्न है और न ही दीर्घकालिक स्थिरता। यह संसाधनों के अभाव में आशा की चिंगारी जलाने की कोशिश जैसा लग रहा है, जहाँ बेवजह तकनीकी समाधान के बजाय मौजूदा स्कूल परिसरों में निरंतर शिक्षण कर्मचारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करना अधिक व्यावहारिक हो सकता था।
सामाजिक स्तर पर इस योजना का प्रभाव असमान है। आर्थिक रूप से असुरक्षित वर्ग के छात्र, जो अक्सर घर पर कॉन्टेंट एवं इंटर्नेट के अभाव में पढ़ाई से दूर रह जाते हैं, उन्हें इन दो हफ्तों के सत्रों में भी पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाता। इसके विपरीत, बेहतर सुविधाओं वाले अभिभावक इन सत्रों को अतिरिक्त ट्यूशन के रूप में उपयोग कर सकते हैं, जिससे अवसर असमानता और बढ़ सकती है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया में कहा गया है कि यह कदम “शिक्षा की कड़ाई को बनाए रखेगा” और “छात्रों को परीक्षा‑केन्द्रित तैयारी में मदद करेगा”। वास्तविकता में, यह केवल सरकारी कैलेंडर को भरने वाला एक कलात्मक कदम प्रतीत होता है—छुट्टियों के बीच के अंतर को कम करने के लिये छोटा‑छोटा पैचवर्क।
विस्तारित विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि केवल दो हफ्ते की “रिमिडियल क्लासेस” से मौलिक शैक्षणिक विभेदन को समाप्त करने की आशा व्यावहारिक नहीं है। स्थायी सुधार के लिये शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यपुस्तक अद्यतन, शैक्षिक तकनीक में निवेश और निरंतर निगरानी प्रणाली की आवश्यकता है, न कि ग्रीष्मकालीन कैलेंडर पर “सिर्फ‑गर्मियों‑के‑बिच‑पैसे‑बचाने‑के‑लिए” चिपकाई गई त्वरित उपाय।
आगे की नीति‑पंक्तियों में यह प्रश्न उठता है: क्या दिल्ली सरकार अपने शैक्षिक ढाँचे में गहरी खाइयाँ पाटने के लिये अस्थायी समाधान के बजाय प्रणालीगत सुधारों को प्राथमिकता देगी, या यही “छुट्टियों‑के‑बीच‑दौड़‑भेज़” का चक्र बना रहेगा?
Published: May 9, 2026