तिरुपति विश्वनाथ मंदिर में भीड़, स्वच्छता और प्रशासन की चूक
दक्षिण भारत के तिरुपति में स्थित त्रिकाला वेणुकेश्वर मंदिर, अप्रैल 2026 तक देश का सबसे अधिक यात्रियों को आकर्षित करने वाला मंदिर बन गया है। वार्षिक दर्जनों मिलियन श्रव्य‑दर्शी यहाँ आते हैं, जो व्यवसाय, पर्यटन और आध्यात्मिकता के बीच जटिल सामाजिक ताना‑बाना बुनते हैं। लेकिन इस आध्यात्मिक पुलित्रम में भीड़‑भाड़ के संग्राहकों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
भारी भीड़ के परिणामस्वरूप स्वास्थ्य‑संबंधी चुनौतियां बढ़ी हैं। तापीय तनाव, डिहाइड्रेशन और लालिमा से लेकर संक्रामक रोगों के प्रकोप तक, कई बार आपातकालीन सेवाओं पर दबाव बना है। अस्थायी चिकित्सा शिविरों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से सीमित रहती है, जबकि निजी क्लिनिकों के ऊँचे खर्चे गरीब तीर्थयात्रियों को बाहर कर देते हैं। यह असमानता तब और स्पष्ट होती है जब सरकार के ‘आधारभूत स्वास्थ्य सहायता’ योजनाएँ निर्धारित मानकों से कम ही लागू होती हैं।
स्वच्छता के मामले में स्थिति और अधिक चौंकाने वाली है। सीमित शौचालय सुविधाएँ, अपर्याप्त कचरा निपटान प्रणाली और नियमित सफ़ाई की कमी ने न केवल पर्यावरण पर बुरा असर डाला है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा पैदा किया है। कई यात्रियों ने अव्यवस्थित जलस्रोतों से पानी पीने के कारण जलजनित रोगों की शिकायत की है, जबकि प्रशासन केवल ‘स्वच्छता अभ्यास दिवस’ आयोजित करने तक सीमित रह गया है।
वित्तीय असमानता भी इस तीर्थस्थल की सामाजिक तस्वीर को रोशन करती है। ‘जिआइ‑टैग’ प्राप्त लड्डू प्रसाद, जो आध्यात्मिकता का प्रतीक है, अब आधे दर्जन रूपये की कीमत पर बेचा जाता है, जिससे आम नागरिकों के लिए इसकी उपलब्धता सीमित हो गई है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या आध्यात्मिक पुरस्कार की कीमत को आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए सुलभ रखना नीतियों की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया के दृष्टिकोण से, कई योजनाएँ कागज़ी तौर पर मौजूद हैं: यात्रा सहायता योजना, ‘एक कदम भीड़‑प्रबंधन’ कार्यकम और ‘डिजिटल थ्रू‑पुट’ इंटरेक्टिव प्लेटफ़ॉर्म। परंतु इनका व्यावहारिक कार्यान्वयन अक्सर अधूरा रह जाता है। उदाहरण के तौर पर, डिजिटल टिकटिंग प्रणाली को लेकर कई यात्रियों ने नेटवर्क कनेक्शन की कमी और वैध पहचान प्रमाणों की बाध्यता को कठिनाई बताई। इसी तरह, ‘आधारभूत स्वास्थ्य मोड्यूल’ का प्रस्ताव सुनहरा लगा, परंतु जमीन पर साधारण सुविधाओं की कमी ने इसे केवल शब्दों तक सीमित रख दिया।
व्यंग्य के स्तर पर कहा जा सकता है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर ‘डिजिटल इंडिया’ को गली‑गली में फैलाने का लक्ष्य है, तो तिरुपति की भीड़‑भाड़ वाली पंक्तियों में बसें‑औजार‑आधार की कमी ही रह जाती है। प्रशासन की भागीदारी नज़र आती है, परंतु अक्सर वह ‘देखा‑जाए‑गया’ की सीमाओं में ही रहती है, जिससे वास्तविक समस्या का समाधान नहीं बनता।
समग्र रूप से कहा जाए तो, तिरुपति विश्वनाथ मंदिर की आध्यात्मिक आकर्षण जैसे लोकप्रिय हो, वैसे ही सामाजिक, स्वास्थ्य और प्रशासनिक मुद्दे भी उभरते रहेंगे। यह आवश्यक है कि नीति‑निर्माताओं, स्थानीय प्रशासन और नागरिक समाज के बीच सहयोग को सुदृढ़ किया जाए, ताकि तीर्थयात्रियों को केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सुरक्षित, स्वच्छ और समावेशी अनुभव भी मिल सके। तभी इस प्राचीन पवित्र स्थल की लोकप्रियता को राष्ट्रीय गर्व के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी के उदाहरण के रूप में देखना संभव होगा।
Published: May 5, 2026