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Category: समाज

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त्रिपुरा विश्वविद्यालय के प्रोविज़नल परिणामों की ऑनलाइन घोषणा पर छात्रों को डिजिटल बाधाओं का सामना

त्रिपुरा विश्वविद्यालय ने हाल ही में एलएलबी, बी.एससी. आईटी, लाइब्रेरी विज्ञान तथा संबंधित स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के प्रथम, तृतीय और पंचम सेमेस्टर के प्रोविज़नल परिणाम आधिकारिक पोर्टल पर प्रकाशित कर दिए हैं। छात्रों को अपने लॉग‑इन विवरण दर्ज कर स्कोरकार्ड देखना होगा, लेकिन इस प्रक्रिया ने कई सामाजिक प्रश्न उठाए हैं।

डिजिटल इंडिया के घोषणापत्र के बावजूद, राज्य के कई ग्रामीण एरिया में स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी एक विलासिता है। विश्वविद्यालय के पोर्टल पर ‘लॉगिन’ बटन की चमकदार लाइटिंग के सामने, उन विद्यार्थियों की निराशा स्पष्ट है जो दिन‑रात मॉडेम की सिग्नल शक्ति को देखते रहे हैं। परिणाम तक पहुँचने के लिए आवश्यक अभिप्रमाणन प्रक्रिया, दो‑तीन बार पासवर्ड रीसेट की सुविधा, और कधिनरूप में लोड‑शेयरिंग, सभी ही डिजिटल असमानता के संकेतक बन गए हैं।

परिणामों का प्रोविज़नल स्वरूप भी छात्रों के भविष्य को अस्थिर कर रहा है। कई विद्यार्थियों ने बताया कि आगे की पढ़ाई या नौकरी के आवेदन के लिए अंतिम अंक आवश्यक हैं, परंतु प्रोविज़नल स्कोरकार्ड की अस्पष्टता और समय-समय पर आ रही सहायक (सप्लमेंटरी) परिणामों ने अनिश्चितता को बढ़ा दिया है। इससे न केवल शैक्षणिक योजना में बाधा आती है, बल्कि आर्थिक तंगी का भी सिलसिला जारी रहता है, क्योंकि कई छात्र छात्रवृत्ति या क़र्ज़़ के पात्रता मानदंडों पर निर्भर होते हैं।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया के तौर पर विश्वविद्यालय ने पोर्टल का लिंक और लॉगिन निर्देश जारी किए हैं, लेकिन वास्तविक सहायता के लिये एक समर्पित हेल्पडेस्क या मोबाइल‑अनुकूल एप्लिकेशन का अभाव स्पष्ट है। ऐसे में, छात्र यूनियन और स्थानीय NGOs ने हाथ में मोबाइल फोनों के साथ नि:शुल्क इंटरनेट क्याफे स्थापित करने की मांग की है, ताकि “डिजिटल विभाजन” को कम किया जा सके।

शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक मान्यता मिलने के बाद भी, परिणाम प्रकाशन में पारदर्शिता और सुलभता का अभाव प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है। नीति कार्यान्वयन में ‘डिजिटल पोर्टल’ के नाम पर बनावटी तकनीकी समाधान अक्सर असली समस्या—जैसे ग्रामीण कनेक्टिविटी, उपयोगकर्ता‑सुगमता, और समय पर सूचना प्रदान करना—को नजरअंदाज कर देते हैं। यह घटना न केवल छात्रों की शिक्षा‑केंद्रित प्रवृत्तियों को बाधित करती है, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही के सिद्धांतों पर भी सवाल खड़े करती है।

आगे की दिशा में, शैक्षणिक संस्थानों को चाहिए कि वे परिणाम प्रकाशित करने के साथ ही विभिन्न स्तरों पर निरंतर ऑनलाइन सहारा, मोबाइल‑पहले इंटरफ़ेस, तथा स्थानीय सायबर‑कैफ़े सहयोगी नेटवर्क स्थापित करें। तभी प्रावैधानिक परिणामों को मात्र आँकड़ों से आगे बढ़ाकर वास्तविक सामाजिक मूल्य प्रदान किया जा सकेगा।

Published: May 7, 2026