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त्रंप प्रशासन की आपदा परिषद ने FEMA में व्यापक सुधार का प्रस्ताव रखा
संयुक्त राज्य अमेरिका में आपदा प्रबंधन प्रणाली के पुनर्गठन की मांग करते हुए, एक विशेषज्ञ समूह ने ट्रम्प प्रशासन को तीन प्रमुख परिवर्तन सुझाए हैं। इन सुझावों का फोकस दो मुख्य पहलुओं पर है: आपदा‑पश्चात संघीय सहायता का मानक ऊँचा करना तथा पीड़ितों को धनराशि त्वरित रूप से पहुँचाना।
पहला प्रस्ताव है ‘सहायता की गुणवत्ता में उन्नति’ – यानी केवल गंभीर खतरों पर ही फेडरल मदद प्रदान की जाएगी, जिससे संसाधनों का ‘सही‑समय‑सही‑स्थान’ पर उपयोग सुनिश्चित हो। दूसरा सुझाव है ‘पैसे की त्वरित पहुँच’; वर्तमान में कई महीनों में निलंबित होने वाले दावे, अब स्वचालित प्रणाली के ज़रिये जल्दी निपटाए जाने चाहिए। तीसरा, अधिकतर अनछुए, संस्थागत रूप‑रेखा का पुनर्रचना – FEMA को अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय घटक बनाने का निर्देश, ताकि राहत कार्यों में दोहराव और अकार्यक्षमता समाप्त हो सके।
इन अमेरिकी‑मध्यस्थ विचारों को देखते हुए, भारत में समान चुनौतियाँ स्पष्ट हैं। प्राकृतिक आपदाओं के बाद अक्सर पीड़ितों को राहत मिलने में महीनों का विलंब, असमान वितरण और स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी के अभाव जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। जहाँ FEMA को ‘क्लीन‑स्लेट’ का अवसर दिया गया है, वहीं हमारे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को भी इस तरह की ‘स्ट्रिप्ड‑डाउन’ पॉलिसी की ज़रूरत है।
भारी‑भुगतान‑भेदभाव, सामाजिक वर्गों के बीच असमान पहुँच, और प्रशासनिक लापरवाही के कारण अक्सर कमजोर वर्गों ही पीड़ित होते हैं। विशेषज्ञों के सुझावों में “सहायता की क्वालिटी” केवल तब लागू होना चाहिए जब वास्तविक बर्बादी हो, न कि हर छोटी‑छोटी लापरवाही पर बौझधारी खर्चा हो। इसी लापरवाही से मौजूदा राहत योजना में जंक‑फ़ूड जैसी अनावश्यक वस्तुएँ बजट में पहुँचना जारी रहता है।
इन तीन बिंदुओं पर मौजूदा नीति‑निर्माताओं को ध्यान देना आवश्यक है। न तो यह केवल विदेशी मॉडल अपनाने की बात है, बल्कि हमारे नागरिकों की बुनियादी जीवन‑सुरक्षा को सुधारने का अवसर है। यदि प्रशासनिक उलझनों को दुरुस्त कर, तेज़ी से धनराशि पहुँचाने के तंत्र को व्यवस्थित किया जाए, तो भविष्य में किसी भी आपदा के बाद राहत का ‘आँखों‑के‑सामने’ मैजिक दिखेगा – न कि ‘कागज‑पर‑सौदा’।
Published: May 8, 2026