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Category: समाज

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ड्रोन हमले ने उजागर किया बच्चों की सुरक्षा में नीति खामियों की गंभीरता

रूस के विरुद्ध यूक्रेन द्वारा उपयोग किए गये भट्ठी‑आधारित ड्रोन ने 6 मई को सुमी क्षेत्र के एक कीडरगार्टन को निशाना बनाया, जिससे कई छोटे बच्चों और शिक्षकों को चोटें आईं। तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान की गई, परन्तु त्वरित और समन्वित प्रतिक्रिया की कमी से स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ गया। इस आकस्मिक घातक हमले ने न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि बच्चों के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर भी भयावह प्रभाव डाला।

भारत के सटे‑सटे कई सीमावर्ती क्षेत्रों में भी ड्रोन‑संबंधी सुरक्षा की कमी एक प्रमुख चिंता बनती जा रही है। जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 में स्कूलों को आपात‑कालीन योजना तैयार करने का निर्देश है, अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों में इस दिशा में व्यावहारिक कदमों का अभाव स्पष्ट है। फिर भी, शहरी और ग्रामीण स्कूलों में नियमित सुरक्षा अभ्यास, ड्रोन्स को पहचानने के लिए इलेक्ट्रॉनिक जासूसी उपकरण, या अति‑संकट में बच्चों की त्वरित निकासी के लिये स्पष्ट प्रोटोकॉल अभी भी अधूरी हैं।

शिक्षा के सतत् संचालन को धमकी देने वाली ऐसी असुरक्षा को नज़रअंदाज़ करना, नीति‑निर्माताओं की बेपरवाही को दर्शाता है। राष्ट्रीय शैक्षिक नीति में “सुरक्षित शिक्षा” का उल्लेख है, परंतु इसे जमीन पर उतारने के लिये आवश्यक धन‑संकलन, निगरानी और प्रशिक्षण कार्यक्रम अभी भी ‘कागज़ी बात’ प्रतीत होते हैं। यह स्थिति भारत के कई गरीब वर्गों के लिये विशेष रूप से समस्या बनती है, जहाँ स्कूलों में बुनियादी बुनियादी ढांचा ही अक्सर अभावग्रस्त रहता है।

सामाजिक असमानता के इस परिप्रेक्ष्य में, एक पक्षीय सुरक्षा उपाय केवल शहरी elite‑स्कूलों तक सीमित रहने से, गरीब इलाक़ों के बच्चों को अधिक जोखिम में डालता है। जब सरकारें ड्रोन‑डिटेक्शन प्रणाली की स्थापना को प्राथमिकता नहीं देतीं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सार्वजनिक सुविधाओं की रक्षा में नीति‑कार्यान्वयन से अधिक शब्द‑परिचालन रहता है।

ड्रोन‑आक्रमण की संयोगवश दृश्यता ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या हमारी सार्वजनिक उत्तरदायित्व की भावना, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा के संदर्भ में, पर्याप्त है या नहीं। प्रशासनिक जड़ता और अपर्याप्त निवेश को लेकर इस घटना ने एक कठोर सच्चाई उजागर कर दी: जब तक नीति‑निर्माता और कार्यान्वयनकर्ता मिलकर ‘उड़ते धातु’ को रोकने की ठोस योजना नहीं बनाते, तब तक कक्षा में बंधे हुए बच्चों को सुरक्षा के नज़रिये से नज़र में देखना ही बेहतर लग सकता है।

Published: May 6, 2026