डोपामाइन बर्नआउट: डिजिटल उन्माद ने खुशी के रंग फीके कर दिए
भारत में तेज़ गति वाले इंटरनेट, अल्गोरिद्म‑चालित मनोरंजन और सतत् सूचना‑सरणी ने लोगों के मस्तिष्क में डोपामाइन के स्तर को लगातार बढ़ा‑बढ़ा कर पेश किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निरन्तर उत्तेजना ‘डोपामाइन बर्नआउट’ कहलाने वाली स्थिति की ओर ले जा रही है, जहाँ न्यूरॉन पुरानी प्रैतिक्रिया से थक कर सामान्य सुख‑संधान पर प्रतिक्रिया नहीं देते। परिणामस्वरूप, दैनिक कार्यों में भी रचना, प्रेरणा और एकाग्रता का अभाव महसूस होने लगता है।
समाज के कई वर्ग, विशेषकर शहरी युवा और छात्रों, इस बदलाव को अपनी सीखने‑और‑काम करने की क्षमता में कमी के रूप में प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों में ध्यान‑भंग की शिकायतें, कार्यस्थलों पर उत्पादकता में गिरावट और स्वास्थ्य संबंधी असंतुलन (नींद के विकार, अवसाद की प्रवृत्ति) अब सिर्फ व्यक्तिगत समस्याएं नहीं रह गईं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के दायरे में आती जा रही हैं।
इस पृष्ठभूमि में सरकारी नीतियों की चुप्पी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में कई योजनाएँ बनायीं गई हैं, परन्तु ‘डिजिटल डिटॉक्स’, ‘स्क्रीन टाइम सीमाएँ’ या ‘समुदायिक खेल एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन’ जैसे उपायों को अभी तक आवश्यक प्राथमिकता नहीं मिली है। अभागे वर्गों के पास तो इंटरनेट ही एकमात्र मनोरंजन के साधन है, जिससे उनकी शारीरिक तथा मानसिक पुनर्स्थापना के अवसर सीमित हो रहे हैं।
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि ‘आसान डोपामाइन’ के स्रोत—जैसे सामाजिक मीडिया के निरन्तर लाइक‑अपडेट, तुरंत उपलब्ध वीडियो स्ट्रीम—को कम करके ‘परिश्रम‑आधारित’ गतिविधियों को अपनाया जाए। इसमें नियमित शारीरिक व्यायाम, सामुदायिक सेवाएँ, हाथ‑से‑काम, तथा पढ़ाई‑लिखाई में गहन ध्यान पर आधारित शिक्षण पद्धति शामिल है। ऐसी पहल न केवल मस्तिष्क के पुरस्कार तंत्र को रीसेट कर सकती है, बल्कि सामाजिक बंधन को भी मजबूत कर सकती है।
इसकी सफल कार्यान्वयन के लिए नीतिनिर्माताओं को दो‑तीन कदम उठाने की आवश्यकता है: प्रथम, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक खेल‑सुविधा एवं खुला वर्गीय स्थान बनाकर ‘ऑफ़‑लाइन’ सामाजिक संपर्क को प्रोत्साहित करना; द्वितीय, स्कूल‑कॉलेज के पाठ्यक्रम में ‘डिजिटल वेलनेस’ मॉड्यूल को अनिवार्य करना; तृतीय, निजी टेक कंपनियों को सामाजिक जिम्मेदारी के तहत ‘स्क्रीन‑टाइम मॉनिटरिंग’ टूल्स को मुफ्त में उपलब्ध कराना।
डोपामाइन बर्नआउट को केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं माना जा सकता; यह एक सामूहिक स्वास्थ्य संकट की शुरुआत है, जिसके समाधान में सार्वजनिक नीतियों, सामुदायिक समर्थन और व्यक्तिगत सजगता का सम्मिलित योगदान आवश्यक है। तभी डिजिटल युग में फिर से आनंद, सृजनशीलता और सामाजिक संतुलन की चमक वापस आ पाएगी।
Published: May 3, 2026