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डेन्वर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के म्यूरल: सार्वजनिक निधियों की प्राथमिकता और सामाजिक आकलन
डेन्वर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के प्रमुख दीवारचित्र, कलाकार लियो टैंगुमा द्वारा निर्मित, हाल ही में नवीनीकरण कार्य के दौरान संग्रहित किए गए हैं। प्रथम दृष्टि में ये चित्र शांति व पर्यावरणीय चेतना को दर्शाते हैं—एक छवि में प्रकृति के विनाश के बाद पुनर्निर्माण का आशावादी दृश्य, तथा दूसरे में युद्ध‑रहित भविष्य के सपनों में लिप्त बच्चों की चित्रण। यह कलात्मक अभिव्यक्ति विदेश में ही नहीं, बल्कि भारत में सार्वजनिक स्थानों पर समान कला‑प्रोजेक्टों की वैधता और लागत‑प्रभावशीलता पर प्रश्न उठाती है।
भारतीय प्रशासनिक संदर्भ में अक्सर बुनियादी सुविधाओं—सड़क, जल, स्वास्थ्य—की ज़रूरतों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि सांस्कृतिक पहलें बजट प्रतिबंधों के कारण टालमटोल का शिकार बनती हैं। डेन्वर का मामला, जहाँ दीवारचित्रों को नवीनीकरण के बीच ‘संग्रहीत’ किया गया, यह दर्शाता है कि सार्वजनिक निधियों की बंटवारी में कला को अक्सर पृष्ठभूमि में धकेला जाता है। यदि इसी प्रकार की परियोजनाएँ भारत में चलें, तो कौन‑सी नीतियां यह तय करेंगी कि इन कलाकृतियों को राजस्व‑उत्पादन के लिये या सामाजिक जागरूकता के साधन के रूप में रखा जाए?
सामाजिक असमानता का पहलू भी अनदेखा नहीं रह सकता। कला‑स्थानों तक पहुँच मुख्यतः शहरी अभिजात वर्ग तक सीमित रहती है, जबकि ग्रामीण एवं आर्थिक‑दृष्टि से कमजोर वर्गों के लिये इनका प्रभाव सीमित रहता है। यहाँ प्रशासन की ‘संसाधन‑संतुलन’ नीति की विफलता स्पष्ट होती है: सार्वजनिक धन का निवेश केवल दृश्य‑आकर्षण तक सिमट जाता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी बुनियादी सुविधाओं की गहरी जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं।
डेन्वर के म्यूरलों की संग्रहण प्रक्रिया ने भी प्रशासनिक अतिक्रमण की एक सूक्ष्म झलक दी। नवीनीकरण के दौरान कला को सुरक्षित रखने के बजाय तीक्ष्ण रूप से ‘बंद’ कर देना, यह संकेत देता है कि नीति‑निर्माताओं की प्राथमिकता अक्सर ठोस बुनियादी ढांचे और कम‑लागत वाले ‘संकट‑परिचालन’ पर केंद्रित रहती है, जबकि दीर्घकालिक सामाजिक‑संस्कृतिक लाभ को नज़रअंदाज़ किया जाता है।
इस परिप्रेक्ष्य में, भारतीय नीति‑निर्माताओं को दो प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक है: प्रथम, सार्वजनिक निधियों को सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिये किस हद तक आवंटित किया जाए? द्वितीय, किस प्रकार की जवाबदेही व्यवस्था स्थापित की जाए जिससे कला‑प्रोजेक्टें केवल ‘सजावट’ न रह जाएँ, बल्कि सामुदायिक जागरूकता, शैक्षणिक सामग्री और पर्यावरणीय शिक्षा में योगदान दें? केवल तभी हम इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि कलात्मक अभिव्यक्ति सार्वजनिक खर्च का निष्काम न हो, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का वास्तविक उत्प्रेरक बन सके।
Published: May 6, 2026