डिजिटल व्यक्तित्व परीक्षण: मनोरंजन के बहाने मानसिक स्वास्थ्य पर ढहता ध्यान
वर्तमान में सामाजिक नेटवर्क पर ‘वॉशिंग मशीन की तरह घुमते’ क्विज़, किसी भी विषय पर तुरंत वायरल हो जाते हैं। उनमें से एक – तीन सिरिया वाले फूलदान की पसंद पर आधारित व्यक्तित्व टेस्ट – मात्र सजावट के विकल्प को ‘निर्भरता, रचनात्मकता या संवेदनशीलता’ के मानचित्र में बदल देता है। यह प्रयोग, मूलतः हल्के‑फुल्के मज़े के रूप में शुरू हुआ, परन्तु इस प्रकार की सतही मापदंडीयता ने युवा वर्ग में गहरी आध्यात्मिक अस्थिरता को जन्म दिया है।
एक तरफ़ जहाँ डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर इस प्रकार के कंटेंट का निर्माण कोई लागत नहीं लेता, वहीं दूसरी ओऱ भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच अभी भी महँगी और अनियंत्रित है। राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य नीति के कार्यान्वयन में कई वर्षे की देरी के बाद ही 2024‑25 में “मनोविज्ञान‑साक्षरता अभियान” शुरू किया गया, परन्तु वास्तविकता यह है कि सैर‑सपाटा के ‘व्यक्तित्व क्विज़’ को लेकर जनता की समझदारी अभी तक इस कार्यक्रम की पहुँच से परे है।
शिक्षा‑संस्था में भी इस प्रवृत्ति की गूँज सुनाई देती है। स्कूल‑बोर्ड के पाठ्यक्रम में आलोचनात्मक सोच और वैज्ञानिक तर्कशक्ति को बढ़ावा देने की छवि तो प्रस्तुत है, परन्तु कक्षा‑कूचर में छात्रों को ‘कौन‑सा फूलदान आपके दिल को छुएगा?’ जैसे प्रश्नों से व्यावहारिक सोच के बजाय भावनात्मक पहचान के फँसाने की सुविधा प्रदान की जा रही है। इस दौरान सरकार ने ‘डिजिटल साक्षरता’ को प्राथमिकता देते हुए 2022‑23 में 1.5 करोड़ छात्रों को ऑनलाइन सुरक्षित उपयोग के लिए प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा था, परन्तु व्यवहार में ऐसे पुनरावृत्ति वाले सामग्री के नियमन में स्पष्टता नहीं है।
समानता के दृष्टिकोण से देखी जाए तो यह चुनिंदा परीक्षण शहरी, मध्य‑वर्गीय उपयोगकर्ता वर्ग को अधिक प्रभावित करता है, जहाँ इंटरनेट ढाँचों की पहुँच अधिक है। ग्रामीण एवं दलित‑जनसमुदाय के लोग इन क्विज़ से नजदीकी से वंचित रह जाते हैं, जिससे डिजिटल विभाजन और बढ़ता है। इस असमानता को देखते हुए, सामाजिक न्याय के समर्थक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या मौजूदा ‘डिजिटल कोड‑ऑफ’ में ऐसी सामग्री को नियंत्रित करने की किसी ठोस व्यवस्था की भी कल्पना की गई है।
भाद्रभानु सिंह, एक 23‑वर्षीय कॉलेज छात्र, ने बताया, “मैंने दोस्त की सलाह से वही फूलदान चुना, जिसके बाद मेरे दोस्त मेरे ‘रचनात्मक’ पहलू की प्रशंसा करने लगे। पर असल में मेरे मन में लगातार आत्म‑संदेह का भाव रहता है। ऐसा लगता है कि ये छोटी‑छोटी क्विज़ हमारे वास्तविक मानसिक दबाव को छुपा देती हैं।” ऐसे व्यक्तिगत अनुभव दर्शाते हैं कि ‘मनोरंजन’ के नाम पर वैध मनोवैज्ञानिक परामर्श को अक्सर हल्के‑फुल्के कंटेंट से ओझल कर दिया जाता है।
लॉजिस्टिक रूप से, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 2025 में मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्रों की संख्या दोगुनी करने की घोषणा की गई थी, परन्तु अभी तक केवल 12% राज्यों में पर्याप्त कार्यशील इकाई स्थापित हो पाई है। इस अधूरी कार्यान्वयन के बीच जब सोशल मीडिया पर ‘एक क्लिक में आत्म‑जांच’ की सुविधा का प्रचार जारी है, तो प्रशासनिक उदासीनता का भाव स्पष्ट हो जाता है।
सारांशतः, डिजिटल व्यक्तित्व परीक्षण जैसे ‘तीन फूलदान चुनें और अपना स्वभाव जानें’ जैसी गतिविधियाँ, कहीं न कहीं सामाजिक‑मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियों की ओर संकेत करती हैं। अस्थायी मनोरंजन को दीर्घकालिक मानसिक समर्थन से बदलने के लिए नीति‑निर्माताओं को न केवल नियामक ढाँचा स्थापित करना होगा, बल्कि स्कूल‑कॉलेज‑समुदाय में वैज्ञानिक आलोचनात्मक सोच को सुदृढ़ करना होगा। केवल तभी डिजिटल उद्यमी उपकरणों को ‘मनोरंजन’ की सीमा में रख कर सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी निभा पाएँगे।
Published: May 6, 2026